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हाथ से हर एक मौके को निकल जाने दिया
हमने ही खुशियों को रंजोगम में ढल जाने दिया
जीत बस एक वार कि दुरी पे थी हमसे मगर
दुश्मनों को हमने मैदां में संभल जाने दिया
उम्र भर हम सोचते ही रह गए हर मोड़ पर
फ़िस्लाकुं सारे लम्हों को फिसल जाने दिया
तुम तो एक बदलाव लाने के लिए निकले थे, फिर
खुद को क्यु हालत के हाथो बदल जाने दिया
हम भी वाकिफ थे ख्यालो कि हकीक़त से, मगर
हमने भी दिल को ख्यालो से बहल जाने दिया
रफ्ता-रफ्ता बिजलियों से दोस्ती सी हो गई
रफ्ता-रफ्ता आशियाना हमने जल जाने दिया
टालते है लोग तो सर से मुसीबत कि घडी
हमने लेकिन कामयाबी को भी टल जाने दिया
                                                   - राजेश रेड्डी

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  1. आपका ब्लॉग बहुत दिलकश है...आज पहली बार आना हुआ.
    राजेश भाई की ये गज़ल बहुत खूबसूरत है...प्रस्तुतीकरण का शुक्रिया...

    नीरज

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  2. नीरज जी धन्यवाद | आप लोगो का साथ बस यु ही बना रहे |

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  3. शायद पहली बार आपके व्लाग देखा है अच्छी गज़ल पढने को मिली ,बधाई

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