बना सांस की भाप से (प्रेमसागर) - प्रदीप जैन
हमारे मिल क्षेत्र के जमीन से जुड़े हुए मजदूर और मेहनतकश लोगों के मन में भी कविताएं और गजलें अंगड़ाईयां लेती हैं, इसका प्रमाण दशकों से मिलते रहे हैं। गीत एवं गजलकार प्रेमसागर की रचनाएं ऐसे ही बिलकुल अपने आसपास के वातावरण से उपजी महसूस होती हैं।‘ तन पे कपड़ा सर पे छत हो रोटी घर-घर कर दो ना ‘ , ये पुकार उनकी नज्म से निकली और यह उजागर कर गई कि शायर दुनिया में सुख शांति फैलाने की चाहत रखता है। ये बिलकुल किसी धुर वामपंथी विचारक के दर्शन का निचोड़ है जो दिल की गहराईयों से निकलकर सारी दुनिया में छा जाना चाहता है। शायर प्रेमसागर की रचनाएं बहुत सादा हैं निहायत सरलता से लिखी गई हैं। इनमें किसी लफ्जों की बाजीगरी नहीं है। साठ और सत्तर के दशक में मिल क्षेत्र में धुलेंडी की रात जब होलिका दहन के लिए तैयार हो रही होती थी तो बगल में ही अनौपचारिक कवि सम्मेलन सज जाता था, लकड़ी के स्टूल पर बैठे स्व.रमेश शर्मा ‘मेहबूब‘ अपनी रचनाएं पढ़ते, भांग और शराब की मस्ती में डूबे थके हारे मजदूर श्रोता झूमते हुआ दाद दिए चले जाते थे।
प्रेमसागर उसी निहायत सादा दिल और सरल जबान के रचनाकार हैं जो उसी विरासत को आगे बढ़ाते हुए मालूम होते हैं। मिल क्षेत्र के प्रतिष्ठित कहानीकार स्व.पन्नालाल नारोलिया कहते थे कि "सबसे सरल लिख, और सबसे अलग दिख ‘ प्रेमसागर भी अपनी बात बिना किसी लाग लपेट के कहते जाते हैं।" उनके विचार बिलकुल स्पष्ट हैं जब वे कहते हैं कि ‘मिट्टी के सोंधे बरतन में दाल की खुशबू है अम्मा‘। यह खयाल किसी दूसरे कवि या शायर से प्रभावित होकर नहीं आया है बल्कि सीधे मन की उपज से निकला है। दाल की खुशबू ये बात वही शायर कह सकता है जिसने कभी भूख देखी है और वो दाल रोटी के इंतजार में है जो उसकी अम्मा पका रही है।
यहां गौर कीजिए कि बात केवल दाल पकने की खुशबू या अम्मा की नहीं हो रही है या कि शायर की भूख की भी नहीं है क्योंकि वो उस शाश्वत और चिरंतन सत्य की ओर इशारा कर रहा है जो जन्म जन्मांतरों से हमारे साथ जुड़ा हुआ है।
कवि प्रेमसागर को कवि कहें या शायर ये बड़ा मुश्किल है। जिस अंदाज में वे अपनी रचनाएं सामने रखते हैं यानी मतला, शेर और मकते की बात करते हैं तो एकदम उर्दू के क्लासिकल अंदाज में शायर नजर आते हैं। फिर उनकी नज्म या गीतनुमा रचनाएं उन्हें किसी कवि की तरह पेश करती हैं। यह मसला हमें पाठकों और श्रोताओं पर छोड़ देना चाहिए कि वे प्रेमसागर को किस नाम से पुकारना चाहते हैं। उर्दू के एक शायर हैं 'फहमी बदायूनी' बिलकुल आम जबान में शायरी करते हैं, प्रेमसागर भी अपनी जबान की सरलता से मोह लेते हैं।
जिस तरह के बिम्बों और उपमाओं का इस्तेमाल प्रेमसागर अपना कलाम में करते हैं उन्हें सुनते हुए दिल अश-अश कर उठता है। एक बानगी देखिए 'शीशे पे उसका चेहरा बना सांस की भाप से' से एक मंजर नजरों के सामने खिंच जाता है कि कोई आशिक अपनी मेहबूबा का आइने के पास खड़ा हुआ इंतखाब कर रहा है और लंबी सांस खींचता है। इसी उसांस के साथ आशिक के अंदर जो विरह की आग दहक रही है वह बाहर भाप के रूप में निकल कर शीशे पर मेहबूबा का चेहरा बना रही है। कितनी गहरी बात है जो अत्यंत सादगी से सामने रखी गई है। आप शायर के दिल की गहराईयों में उसकी शायरी की रस्सी पर झूलते हुए ही उतर सकते हैं। आपको शेर के दोनों मिसरों के बीच में छिपे हुए अर्थों को खोजने में कोई मेहनत नहीं करना पड़ रही है। शायर के दिल की बात सीधे आपके दिल में उतर जाती है, बस शर्त यही है कि आप भी शायर की मानिंद जज्बाती और संवेदनशील साबित हों।
शायर प्रेमसागर का एक यूट्यूब चैनल है जिस पर वे रह-रहकर अपनी पोस्ट डाल रहे हैं। उन्हें अच्छे लाइक्स मिल रहे हैं। यदि आप उम्दा शायरी सुनने के शौकीन हैं तो इस चैनल पर उनके कलाम सुन सकते हैं। प्रेमसागर जी को मेरी शुभकामनाएं।
~ प्रदीप जैन