लम्हा लम्हा अपनी ज़हरीली बातों से डसता था - अंजुम तराज़ी

लम्हा लम्हा अपनी ज़हरीली बातों से डसता था, वो मेरा दुश्मन हो कर भी मेरे घर में बसता था

लम्हा लम्हा अपनी ज़हरीली बातों से डसता था

लम्हा लम्हा अपनी ज़हरीली बातों से डसता था
वो मेरा दुश्मन हो कर भी मेरे घर में बसता था

बाप मरा तो बच्चे रोटी के टुकड़े को तरस गए
एक तने से कितनी शाख़ों का जीवन वाबस्ता था

अफ़्वाहों के धुएँ ने कोशिश की है कालक मलने की
वो बिकने की शय होता तो हर क़ीमत पर सस्ता था

इक मंज़र में पेड़ थे जिन पर चंद कबूतर बैठे थे
इक बच्चे की लाश भी थी जिस के कंधे पर बस्ता था

जिस दिन शहर जला था उस दिन धूप में कितनी तेज़ी थी
वर्ना इस बस्ती पर 'अंजुम' बादल रोज़ बरसता था - अंजुम तराज़ी


lamha lamha apni zahrili baaton se dasta tha

lamha lamha apni zahrili baaton se dasta tha
wo mera dushman ho kar bhi mere ghar mein basta tha

bap mara to bachche roti ke tukde ko taras gae
ek tane se kitni shakhon ka jiwan wabasta tha

afwahon ke dhuen ne koshish ki hai kalak malne ki
wo bikne ki shai hota to har qimat par sasta tha

ek manzar mein ped the jin par chand kabutar baithe the
ek bachche ki lash bhi thi jis ke kandhe par basta tha

jis din shahr jala tha us din dhup mein kitni tezi thi
warna is basti par 'anjum' baadal roz barasta tha - Anjum Tarazi
लम्हा लम्हा अपनी ज़हरीली बातों से डसता था, वो मेरा दुश्मन हो कर भी मेरे घर में बसता था, lamha lamha apni zahrili baaton se dasta tha

Post a Comment

कृपया स्पेम न करे |

Previous Post Next Post

Advertisement

preload preload preload preload preload