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अशोक बाबु माहौर

वो यूँ ही
एक मुस्कान
छोड़ चली गई
हाथ हथेली पर रख
किधर गई,
मैं ठगा सा
देखता रहा तन्हा
वो यादें
बेबुनियाद दे गई |

मैं विवश
तड़पता रहा रात भर
सपने जगा जगा कर
हकीकत क्या थी ?
मुझे न पता
वो परी थी
चाँद सी
सुनहरे सपनों की
आँखें गीली कर
धकेल गई |
- अशोक बाबु माहौर

परिचय
अशोक बाबु माहौर आपका पूरा नाम है आप तहसील अम्बाह जिला मुरैना (म.प्र. ) के रहने वाले है और साहित्य की विभिन्न विधाओ में लिखते है | आपकी कई रचनाये विभिन्न सहियिक पत्रिकाओ जिनमे स्वर्गविभा, अनहदकृति, सहित्यकुंज, हिंदीकुंज, साहित्य शिल्पी, पुरवाई, रचनाकार, पूर्वाभास, वेबदुनिया इत्यादि शामिल है |
आपको इ पत्रिका अनहदकृति कि और से विशेष मान्यता सम्मान भी 2014-15 में प्राप्त हुआ |
संपर्क-
ग्राम-कदमन का पुरा, तहसील-अम्बाह ,जिला-मुरैना (म.प्र.) - 476111
ईमेल-ashokbabu.mahour@gmail.com
9584414669 ,8802706980

Roman

wo yun hi
ek muskan
chhod chali gayi
hath hatheli par rakh
kidhar gayi,
mai thaga sa
dekhta raha tanha
wo yade
bebuniyad de gayi.

mai vivash
tadpata raha raat bhar
sapne jaga jaga kar
haqiqat kya thi?
mujhe n pata
wo pari thi
chaand si
sunhare sapno ki
aankhe gili kar
dhakel gayi
-Ashok Babu Mahour
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  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 23 दिसम्बर 2018 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. वाह बहुत खूबसूरत रचना।

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  3. बहुत खूबसूरत

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  4. वाह!!!
    बहुत लाजवाब...

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