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sihasan battisi सिहासन बत्तीसी पहली किश्त

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हम शुरुवात कर रहे है बहुत ही प्रसिद्ध कहानी जिसे हम सभी सिहासन बत्तीसी के नाम से जानते है इस कहानी का प्रकाशन किश्तों में किया जायेगा | सिहा...


हम शुरुवात कर रहे है बहुत ही प्रसिद्ध कहानी जिसे हम सभी सिहासन बत्तीसी के नाम से जानते है इस कहानी का प्रकाशन किश्तों में किया जायेगा |
सिहासन बत्तीसी
बहुत दिनों की बात है। उज्जैन नगरी में राजा भोंज नाम का एक राजा राज करता था। वह बड़ा दानी और धर्मात्मा था। न्याय ऐसा करता कि दूध और पानी अलग-अलग हो जाये। उसके राज में शेर और बकरी एक घाट पानी पीते थे। प्रजा सब तरह से सुखी थी।

नगरी के पास ही एक खेत था, जिसमें एक आदमी ने तरह–तरह की बेलें और साग-भाजियां लगा रक्खी थीं।
एक बार की बात है कि खेत में बड़ी अच्छी फसल हुई। खूब तरकारियां उतरीं, लेकिन खेत के बीचों-बीच थोड़ी-सी जमीन खाली रह गई। बीज उस पर डाले थे, पर जमे नहीं। सो खेत वाले न क्या किया कि वहां खेत की रखवाली के लिए एक मचान बना लिया। पर उसपर वह जैसें ही चढ़ा कि लगा चिल्लाने- “कोई है? राजा भोज को पकड़ लाओं और सजा दो।”

होते-होते यह बात राजा के कानों में पहुंची। राजा ने कहा, “मुझे उस खेत पर ले चलो। मैं सारी बातें अपनी आंखों से देखना और कानों से सुनना चाहता हूं।”

लोग राजा को ले गये। खेत पर पहुंचने ही देखते क्या हैं कि वह आदमी मचान पर खड़ा है और कह रहा है- “राजा भोज को फौरन पकड़ लाओं और मेरा राज उससे ले लो। जाओ, जल्दी जाओं।”
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यह सुनकर राजा को बड़ा डर लगा। वह चुपचाप महल में लौटा आया। फिक्र के मारे उसे रातभर नींद नहीं आयी। ज्यों-त्यों रात बिताई। सवेरा होते ही उसने अपने राज्य के ज्योतिषियों और पंडितों को इकट्ठा किया उन्होंने हिसाब लगाकर बताया कि उस मचान के नीचे धन छिपा है। राजा ने उसी समय आज्ञा दी कि उस जगह को खुदवाया जाय।

खोदते-खोदते जब काफी मिट्टी निकल गई तो अचानक लोगों ने देखा कि नीचे एक सिंहासन है। उनके अचरज का ठिकाना न रहा। राजा को खबर मिली तो उसने उसे बाहर निकालने को कहा, लेकिन लाखों मजदूरों के जोर लगाने पर भी वह सिंहासन

सिंहासन के चारों ओर आठ-आठ पुतलियां खड़ी थीं।

टस-से मस-न हुआ। तब एक पंडित ने बताया कि यह सिंहासन देवताओं का बनाया हुआ है। अपनी जगह से तबतक नहीं हटेगा जबतक कि इसकों कोई बलि न दी जाय।

राजा ने ऐसा ही किया। बलि देते ही सिहांसन ऐसे ऊपर उठ आया, मानों फूलों का हो। राजा बड़ा खुश हुआ। उसने कहा कि इसे साफ करो। सफाई की गई। वह सिंहासन ऐसा चमक उठा कि अपने मुंह देख लो। उसमें भांति-भांति के रत्न जड़ें थे, जिनकी चमक से आंखें चौधियाती थीं। सिंहासन के चारों ओर आठ-आठ पुतलियां बनी थीं। उनके हाथ में कमल का एक-एक फूल था। कहीं-कहीं सिंहासन का रंग बिगड़ गया था। कहीं कहीं से रत्न निकल गये थें। राजा ने हुक्म दिया कि खजाने से रुपया लेकर उसे ठीक कराओ।

ठीक होने में पांच महीने लगे। अब सिंहासन ऐसा हो गया था। कि जो भी देखता, देखता ही रह जाता। पुतलियां ऐसी लगतीं, मानो अभी बोल उठेंगीं।

राजा ने पंडितों को बुलाया और कहा, “तुम लोग कोई अच्छा मुहूर्त निकालो। उसी दिन मैं इस सिंहासन पर बैठूंगा।” एक दिन तय किया गया। दूर-दूर तक लोगों को निमंत्रण भेजे गये। तरह-तरह के बाजे बजने लगे, महलों में खुशियों मनाई जाने लगीं।

सब लोगों के सामने राजा सिंहासन के पास जाकर खड़े हो गये। लेकिन जैसे ही उन्होंने अपना दाहिना पैर बढ़ाकर सिंहासन पर रखना चाहा कि सब-की-सब पुतलियां खिलखिला कर हंस पड़ी। लोगों को बड़ा अचंभा हुआ कि ये बेजान पुतलियां कैसें हंस पड़ी। राजा ने डर के मारे अपना पैर खींच लिया और पुतलियों से बोला, “ओ पुतलियों! सच-सच बताओं कि तुम क्यों हंसी?”

पहली पुतली का नाम था। रत्नमंजरी। राजा की बात सुनकर वह बोली, ” राजन! आप बड़े तेजस्वी हैं, धनी हैं, बलवान हैं, लेकिन घमंड करना ठीक नहीं। सुनो! जिस राजा का यह सिहांसन है, उसके यहां तुम जैसे तो हजारों नौकर-चाकर थे।”

यह सुनकर राजा आग-बबूला हो गया। बोला, “मैं अभी इस सिहांसन को तोड़कर मिट्टी में मिला दूंगा।”

पुतली ने शांति से कहा, “महाराज! जिस दिन राजा विक्रमादित्य से हम अलग हुई उसी दिन हमारे भाग्य फूट गये, हमारे लिए सिंहासन धूल में मिल गया।”

राजा का गुस्सा दूर हो गया। उन्होंने कहा, “पुतली रानी! तुम्हारी बात मेरी समझ में नहीं आयी। साफ-साफ कहो।”

पुतली ने कहा, “अच्छा सुनो।”

(इस कहानी में बत्तीस पुतलिया है जिनके नाम है
रत्नमंजरी
चित्रलेखा
चन्द्रकला
कामकंदला
लीलावती
रविभामा
कौमुदी
पुष्पवती
मधुमालती
प्रभावती
त्रिलोचना
पद्मावती
कीर्तिमती
सुनयना
सुन्दरवती
सत्यवती
सिंहासन बत्तीसी
विद्यावती
तारावती
रुपरेखा
ज्ञानवती
चन्द्रज्योति
अनुरोधवती
धर्मवती
करुणावती
त्रिनेत्री
मृगनयनी
मलयवती
वैदेही
मानवती
जयलक्ष्मी
कौशल्या
रानी रुपवती)

पहली पुतली रत्नमंजरी
अंबावती में एक राजा राज करता था। उसका बड़ा रौब-दाब था। वह बड़ा दानी था। उसी राज्य में धर्मसेन नाम का एक और बड़ा राजा हुआ। उसकी चार रानियां थी। एक थी ब्राहृण दूसरी क्षत्रिय, तीसरी वैश्य और चौथी शूद्र। ब्राहृणी से एक पुत्र हुआ, जिसका नाम ब्राहृणीत रक्खा गया। क्षत्राणी से तीन बेटे हुए। एक का नाम शंख, दूसरे का नाम विक्रमादित्य और तीसरे का भर्तृहरि रक्खा गया। वैश्य से एक लड़का हुआ, जिसका नाम चंद्र रक्खा गया। शूद्राणी से धन्वन्तारि हुए।

जब वे लड़के बड़े हुए तो ब्राह्यणी का बेटा दीवान बना। बाद में वहां बड़े झगड़े हुए। उनसे तंग आकर वह लड़का घर से निकल पड़ा और धारापूर आया। हे राजन्! वहां का राज तुम्हारा बाप था। उस लड़के ने किया क्या कि राजा को मार डाला और राज्य अपने हाथ में करके उज्जैन पहुंचा। संयोग की बात कि उज्जैन में आते ही वह मर गया। उसके मरने पर क्षत्राणी का बेटा शंख गद्दी पर बैठा। कुछ समय बाद विक्रमादित्य ने चालाकी से शंख को मरवा डाला और स्वयं गद्दी पर बैठ गया।

एक दिन राजा विक्रमादित्य शिकार खेलने गया। बियावान जंगल। रास्ता सूझे नहीं। वह एक पेड़ चढ़ गया। ऊपर जाकर चारों ओर निगाह दौड़ाई तो पास ही उसे एक बहुत बड़ा शहर दिखाई दिया। अगले दिन राजा ने अपने नगर में लौटकर उसे बुलवाया। वह आया। राजा ने आदर से उसे बिठाया और शहर के बारे में पूछा तो उसने कहा, “वहां बाहुबल नाम का राजा बहुत दिनों से राज करता है। आपके पिता गंधर्वसेन उसके दीवान थे। एक बार राजा को उन पर अविश्वास हो गया और उन्हें नौकरी से अलग कर दिया। गंधर्बसेन अंबावती नगरी में आये और वहां के राजा हो गये। हे राजन्! आपको जग जानता है, लेकिन जबतक राजा बाहुबल आपका राजतिलक नहीं करेगा, तबतक आपका राज अचल नहीं होगा। मेरी बात मानकर राजा के पास जाओं और प्यार में भुलाकर उससे तिलक कराओं।”

विक्रमादित्य ने कहा, “अच्छा।” और वह लूतवरण को साथ लेकर वहां गया। बाहुबल ने बड़े आदर से उसका स्वागत किया और बड़े प्यार से उसे रक्खा। पांच दिन बीत गये। लूतवरण ने विक्रमादित्य से कहा, “जब आप विदा लोगे तो बाहुबल आपसे कुछ मांगने को कहेगा। राजा के घर में एक सिंहासन हैं, जिसे महादेव ने राजा इन्द्र को दिया था। और इन्द्र ने बाहुबल को दिया। उस सिंहासन में यह गुण है कि जो उसपर बैठेगा। वह सात द्वीप नवखण्ड पृथ्वी पर राज करेगा। उसमें बहुत-से जवाहरात जड़े हैं। उसमें सांचे में ढालकर बत्तीस पुतलियां लगाई गई है। हे राजन्! तुम उसी सिंहासन को मागं लेना।”

अगले दिन ऐसा ही हुआ। जब विक्रमादित्य विदा लेने गया तो उसने वही सिंहासन मागं लिया। सिंहासन मिल गया। बाहुबल ने विक्रमादित्य को उसपर विठाकर उसका तिलक किया और बड़े प्रेम से उसे विदा किया।

इससे विक्रमादित्य का मान बढ़ गया। जब वह लौटकर घर आया तो दूर-दूर के राजा उससे मिलने आये। विक्रमादित्य चैन से राज करने लगा।

एक दिन राजा ने सभा की और पंडितों को बुलाकर कहा, “मैं एक अनुष्ठान करना चाहता हूं। आप देखकर बतायें कि मैं इसके योग्य हूं। या नहीं।” पंडितों ने कहा, “आपका प्रताप तीनों लोकों में छाया हुआ है। आपका कोई बैरी नहीं। जो करना हो, कीजिए।” पंडितों ने यह भी बताया कि अपने कुनबे के सब लोगों को बुलाइये, सवा लाख कन्यादान और सवा लाख गायें दान कीजिए, ब्राह्याणों को धन दीजियें, जमींदारों का एक साल का लगान माफ कर दीजिये।”

राजा ने यह सब किया। एक बरस तक वह घर में बैठा पुराण सुनता रहा। उसने अपना अनुष्ठान इस ढंग से पूरा किया कि दुनिया के लोग धन्य –धन्य करते रहे।

इतना कहकर पुतली बोली, “हे राजन्! तुम ऐसे हो तो सिंहासन पर बैठो।”

पुतली की बात सुनकर राजा भोज ने अपने दीवान को बुलाकर कहा, ” आज का दिन तो गया। अब तैयारी करो, कल सिंहासन पर बैठेंगे।”

अगले दिन जैसे ही राजा ने सिंहासन पर बैठना चाहा कि दूसरी पुतली, हैं जो राजा विक्रमादित्य जैसा गुणी हो।”

राजा ने पूछा, “विक्रमादित्य में क्या गुण थे?”

पुतली ने कहा, “सुनो।”

दूसरी पुतली चित्रलेखा

एक बार राजा विक्रमादित्य की इच्छा योग साधने की हुई। अपना राजपाट अपने छोटे भाई भर्तृहरि को सौंपकर वह अंग में भभूत लगाकर जंगल में चले गये।

उसी जंगल में एक ब्राह्यण तपस्या कर रहा था। एक दिन देवताओं ने प्रसन्न होकर उस ब्राह्यण को एक फल दिया और कहा, “जो इसे खा लेगा, वह अमर हो जायगा।” ब्राह्यण ने उस फल को अपनी ब्राह्यणी को दे दिया। ब्राह्याणी ने उससे कहा, “इसे राजा को दे आओं और बदले में कुछ धन ले आओ।” ब्राह्यण ने जाकर वह फल राजा को दे दिया। राजा अपनी रानी को बुहत प्यार करता था, उससे कहा, “इसे अपनी रानी का दे दिया। रानी की दोस्ती शहर के कोतवाल से थी। रानी ने वह फल उस दे दिया। कोतवाल एक वेश्या के पास जाया करता था। वह फल वेश्या के यहां पहुंचा। वेश्या ने सोचा कि, “मैं अमर हो जाऊंगी तो बराबर पाप करती रहूंगी। अच्छा होगा कि यह फल राजा को दे दूं। वह जीयेगा तो लाखों का भला करेगा।” यह सोचकर उसने दरबार में जाकर वह फल राजा को दे दिया। फल को देखकर राजा चकित रह गया। उसे सब भेद मालूम हुआ तो उसे बड़ा दु:ख हुआ। उसे दुनिया बेकार लगने लगी। एक दिन वह बिना किसी से कहे-सुने राजघाट छोड़कर घर से निकल गया। राजा इंद्र को यह मालूम हुआ तो उन्होंने राज्य की रखवाली के लिए एक देव भेज दिया।

उधर जब राजा विक्रमादित्य का योग पूरा हुआ तो वह लौटे। देव ने उन्हे रोकां विक्रमादित्य ने उससे पूछा तो उसने सब हाल बता दिया। विक्रमादित्य ने अपना नाम बताया, फिर भी देव उन्हें न जाने दिया। बोला, “तुम विक्रमाकिदत्य हो तो पहले मुझसे लड़ों।”

दोनों में लड़ाई हुई। विक्रमादित्य ने उसे पछाड़ दिया। देव बोला, “तुम मुझे छोड़ दो। मैं तुम्हारी जान बचाता हूं।”

राजा ने पूछा, “कैसे?”

देव बोला, “इस नगर में एक तेली और एक कुम्हार तुम्हें मारने की फिराक में है। तेजी पाताल में राज करता है। और कुम्हार योगी बना जंगल में तपस्या करता है। दोनों चाहते हैं कि एक दूसरे को और तुमको मारकर तीनों लोकों का राज करें।


“तुम विक्रमादित्य हो तो पहले मुझसे’ लड़ो।”

योगी ने चालाकी से तेली को अपने वश में कर लिया है। और वह अब सिरस के पेड़ पर रहता है। एक दिन योगी तुम्हें बुलायगा और छल करके ले जायगा। जब वह देवी को दंडवत करने को कहे तो तुम कह देना कि मैं राजा हूं। दण्डवत करना नहीं जानता। तुम बताओं कि कैसे करुं। योगी जैसे ही सिर झुकाये, तुम खांडे से उसका सिर काट देना। फिर उसे और तेली को सिरस के पेड़ से उतारकर देवी के आगे खौलते तेल के कड़ाह में डाल देना।”
राजा ने ऐसा ही किया। इससे देवी बहुत प्रसन्न हुई और उसने दो वीर उनके साथ भेज दिये। राजा अपने घर आये और राज करने लगे। दोनों वीर राजा के बस में रहे और उनकी मदद से राजा ने आगे बड़े–बडे काम किये।

इतना कहकर पुतली बोली, “राजन्! क्या तुममें इतनी योग्यता है? तुम जैसे करोड़ो राजा इस भूमि पर हो गये है।”

दूसरा दिन भी इसी तरह निकल गया।

तीसरे दिन जब वह सिंहासन पर बैठने को हुआ तो रविभामा नाम की तीसरी पुतली ने उसे रोककर कहा, “हे राजन्! यह क्या करते हो? पहले विक्रमादित्य जैसे काम करों, तब सिंहासन पर बैठना!”

राजा ने पूछा, “विक्रमादित्य ने कैसे काम किये थे?”

पुतली बोली, “लो, सुनो।”

तीसरी पुतली चन्द्रकला

तीसरी पुतली चन्द्रकला ने जो कथा सुनाई वह इस प्रकार है- एक बार पुरुषार्थ और भाग्य में इस बात पर ठन गई कि कौन बड़ा है। पुरुषार्थ कहता कि बगैर मेहनत के कुछ भी सम्भव नहीं है जबकि भाग्य का मानना था कि जिसको जो भी मिलता है भाग्य से मिलता है परिश्रम की कोई भूमिका नहीं होती है। उनके विवाद ने ऐसा उग्र रुप ग्रहण कर लिया कि दोनों को देवराज इन्द्र के पास जाना पड़ा। झगड़ा बहुत ही पेचीदा था इसलिए इन्द्र भी चकरा गए। पुरुषार्थ को वे नहीं मानते जिन्हें भाग्य से ही सब कुछ प्राप्त हो चुका था। दूसरी तरफ अगर भाग्य को बड़ा बताते तो पुरुषार्थ उनका उदाहरण प्रस्तुत करता जिन्होंने मेहनत से सब कुछ अर्जित किया था। असमंजस में पड़ गए और किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचे। काफी सोचने के बाद उन्हें विक्रमादित्य की याद आई। उन्हें लगा सारे विश्व में इस झगड़े का समाधान सिर्फ वही कर सकते है।

उन्होंने पुरुषार्थ और भाग्य को विक्रमादित्य के पास जाने के लिए कहा। पुरुषार्थ और भाग्य मानव भेष में विक्रम के पास चल पड़े। विक्रम के पास आकर उन्होंने अपने झगड़े की बात रखी। विक्रमादित्य को भी तुरन्त कोई समाधान नहीं सूझा। उन्होंने दोनों से छ: महीने की मोहलत मांगी और उनसे छ: महीने के बाद आने को कहा। जब वे चले गए तो विक्रमादित्य ने काफी सोचा। किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सके तो उन्होंने सामान्य जनता के बीच भेष बदलकर घूमना शुरु किया। काफी घूमने के बाद भी जब कोई संतोषजनक हल नहीं खोज पाए तो दूसरे राज्यों में भी घूमने का निर्णय किया। काफी भटकने के बाद भी जब कोई समाधान नहीं निकला तो उन्होंने एक व्यापारी के यहाँ नौकरी कर ली। व्यापारी ने उन्हें नौकरी उनके यह कहने पर कि जो काम दूसरे नहीं कर सकते हैं वे कर देंगे, दी।

कुछ दिनों बाद वह व्यापारी जहाज पर अपना माल लादकर दूसरे देशों में व्यापार करने के लिए समुद्री रास्ते से चल पड़ा। अन्य नौकरों के अलावा उसके साथ विक्रमादित्य भी थे। जहाज कुछ ही दूर गया होगा कि भयानक तूफान आ गया। जहाज पर सवार लोगों में भय और हताशा की लहर दौड़ गई। किसी तरह जहाज एक टापू के पास आया और वहाँ लंगर डाल दिया गया। जब तूफान समाप्त हुआ तो लंगर उठाया जाने लगा। मगर लंगर किसी के उठाए न उठा। अब व्यापारी को याद आया कि विक्रमादित्य ने यह कहकर नौकरी ली थी कि जो कोई न कर सकेगा वे कर देंगे। उसने विक्रम से लंगर उठाने को कहा। लंगर उनसे आसानी से उठ गया। लंगर उठते ही जहाज ऐसी गति से बढ़ गया कि टापू पर विक्रम छूट गए।

उनकी समझ में नहीं आया क्या किया जाए। द्वीप पर घूमने-फिरने चल पड़े। नगर के द्वार पर एक पट्टिका टंगी थी जिस पर लिखा था कि वहाँ की राजकुमारी का विवाह विक्रमादित्य से होगा। वे चलते-चलते महल तक पहुँचे। राजकुमारी उनका परिचय पाकर खुश हुई और दोनों का विवाह हो गया। कुछ समय बाद वे कुछ सेवकों को साथ ले अपने राज्य की ओर चल पड़े। रास्ते में विश्राम के लिए जहाँ डेरा डाला वहीं एक सन्यासी से उनकी भेंट हुई। सन्यासी ने उन्हें एक माला और एक छड़ी दी। उस माला की दो विशेषताएँ थीं- उसे पहननेवाला अदृश्य होकर सब कुछ देख सकता था तथा गले में माला रहने पर उसका हर कार्य सिद्ध हो जाता। छड़ी से उसका मालिक सोने के पूर्व कोई भी आभूषण मांग सकता था।

सन्यासी को धन्यवाद देकर विक्रम अपने राज्य लौटे। एक उद्यान में ठहरकर संग आए सेवकों को वापस भेज दिया तथा अपनी पत्नी को संदेश भिजवाया कि शीघ्र ही वे उसे अपने राज्य बुलवा लेंगे।

उद्यान में ही उनकी भेंट एक ब्राह्मण और एक भाट से हुई। वे दोनों काफी समय से उस उद्यान की देखभाल कर रहे थे। उन्हें आशा थी कि उनके राजा कभी उनकी सुध लेंगे तथा उनकी विपन्नता को दूर करेंगे। विक्रम पसीज गए। उन्होंने सन्यासी वाली माला भाट को तथा छड़ी ब्राह्मण को दे दी। ऐसी अमूल्य चीजें पाकर दोनों धन्य हुए और विक्रम का गुणगान करते हुए चले गए।

विक्रम राज दरबार में पहुँचकर अपने कार्य में संलग्न हो गए। छ: मास की अवधि पूरी हुई तो पुरुषार्थ तथा भाग्य अपने फैसले के लिए उनके पास आए। विक्रम ने उन्हें बताया कि वे एक-दूसरे के पूरक हैं।

उन्हें छड़ी और माला का उदाहरण याद आया। जो छड़ी और माला उन्हें भाग्य से सन्यासी से प्राप्त हुई थीं उन्हें ब्राह्मण और भाट ने पुरुषार्थ से प्राप्त किया। पुरुषार्थ और भाग्य पूरी तरह संतुष्ट होकर

वहाँ से चले गए।

चौथी पुतली कामकंदला

चौथी पुतली कामकंदला की कथा से भी विक्रमादित्य की दानवीरता तथा त्याग की भावना का पता चलता है। वह इस प्रकार है-

एक दिन राजा विक्रमादित्य दरबार को सम्बोधित कर रहे थे तभी किसी ने सूचना दी कि एक ब्राह्मण उनसे मिलना चाहता है। विक्रमादित्य ने कहा कि ब्राह्मण को अन्दर लाया जाए। जब ब्राह्मण उनसे मिला तो विक्रम ने उसके आने का प्रयोजन पूछा। ब्राह्मण ने कहा कि वह किसी दान की इच्छा से नहीं आया है, बल्कि उन्हें कुछ बतलाने आया है। उसने बतलाया कि मानसरोवर में सूर्योदय होते ही एक खम्भा प्रकट होता है जो सूर्य का प्रकाश ज्यों-ज्यों फैलता है ऊपर उठता चला जाता है और जब सूर्य की गर्मी अपनी पराकाष्ठा पर होती है तो सूर्य को स्पर्श करता है। ज्यों-ज्यों सूर्य की गर्मी घटती है छोटा होता जाता है तथा सूर्यास्त होते ही जल में विलीन हो जाता है। विक्रम के मन में जिज्ञासा हुई कि ब्राह्मण का इससे अभिप्राय क्या है। ब्राह्मण उनकी जिज्ञासा को भाँप गया और उसने बतलाया कि भगवान इन्द्र का दूत बनकर वह आया है ताकि उनके आत्मविश्वास की रक्षा विक्रम कर सकें। उसने कहा कि सूर्य देवता को घमण्ड है कि समुद्र देवता को छोड़कर पूरे ब्रह्माण्ड में कोई भी उनकी गर्मी को सहन नहीं कर सकता।

देवराज इन्द्र उनकी इस बात से सहमत नहीं हैं। उनका मानना हे कि उनकी अनुकम्पा प्राप्त मृत्युलोक का एक राजा सूर्य की गर्मी की परवाह न करके उनके निकट जा सकता है। वह राजा आप हैं। राजा विक्रमादित्य को अब सारी बात समझ में आ गई। उन्होंने सोच लिया कि प्राणोत्सर्ग करके भी सूर्य भगवान को समीप से जाकर नमस्कार करेंगे तथा देवराज के आत्मविश्वास की रक्षा करेंगे। उन्होंने ब्राह्मण को समुचित दान-दक्षिणा देकर विदा किया तथा अपनी योजना को कार्य-रुप देने का उपाय सोचने लगे। उन्हें इस बात की खुशी थी कि देवतागण भी उन्हें योग्य समझते हैं। भोर होने पर दूसरे दिन वे अपना राज्य छोड़कर चल पड़े। एकान्त में उन्होंने माँ काली द्वारा प्रदत्त दोनों बेतालों का स्मरण किया। दोनों बेताल तत्क्षण उपस्थित हो गए।

विक्रम को उन्होंने बताया कि उन्हें उस खम्भे के बारे में सब कुछ पता है। दोनों बेताल उन्हें मानसरोवर के तट पर लाए। रात उन्होंने हरियाली से भरी जगह पर काटी और भोर होते ही उस जगह पर नज़र टिका दी जहाँ से खम्भा प्रकट होता। सूर्य की किरणों ने ज्योंहि मानसरोवर के जल को छुआ कि एक खम्भा प्रकट हुआ। विक्रम तुरन्त तैरकर उस खम्भे तक पहुँचे। खम्भे पर ज्योंहि विक्रम चढ़े जल में हलचल हुई और लहरें उठकर विक्रम के पाँव छूने लगीं। ज्यों-ज्यों सूर्य की गर्मी बढी, खम्भा बढ़ता रहा। दोपहर आते-आते खम्भा सूर्य के बिल्कुल करीब आ गया। तब तक विक्रम का शरीर जलकर बिल्कुल राख हो गया था। सूर्य भगवान ने जब खम्भे पर एक मानव को जला हुआ पाया तो उन्हें समझते देर नहीं लगी कि विक्रम को छोड़कर कोई दूसरा नहीं होगा। उन्होंने भगवान इन्द्र के दावे को बिल्कुल सच पाया।

उन्होंने अमृत की बून्दों से विक्रम को जीवित किया तथा अपने स्वर्ण कुण्डल उतारकर उन्हें भेंट कर दिए। उन कुण्डलों की विशेषता थी कि कोई भी इच्छित वस्तु वे कभी भी प्रदान कर देते। सूर्य देव ने अपना रथ अस्ताचल की दिशा में बढ़ाया तो खम्भा घटने लगा। सूर्यास्त होते ही खम्भा पूरी तरह घट गया और विक्रम जल पर तैरने लगे। तैरकर सरोवर के किनारे आए और दोनों बेतालों का स्मरण किया। बेताल उन्हें फिर उसी जगह लाए जहाँ से उन्हें सरोवर ले गए थे। विक्रम पैदल अपने महल की दिशा में चल पड़े। कुछ ही दूर पर एक ब्राह्मण मिला जिसने उनसे वे कुण्डल मांग लिए। विक्रम ने बेहिचक उसे दोनों कुण्डल दे दिए। उन्हें बिल्कुल मलाल नहीं हुआ।

पांचवी पुतली लीलावती

एक बार दो आदमी आपस में झगड़ रहे थे। एक कहता था कि तकदीर बड़ी है, दूसरा कहता था कि पुरुषार्थ बड़ा है। जब किसी तरह मामला न निबटा तो वे इन्द्र के पास गये। इन्द्र ने उन्हें विक्रमादित्य के पास भेज दिया। राजा ने उनकी बात सुनी और कहा कि छ: महीने बाद आना। इसके बाद राजा ने किया क्या कि भेस बदलकर स्वयं यह देखने निकल पड़ा कि तकदीर और पुरुषार्थ में कौन बड़ा हैं।

घूमते-घूमते उसे एक नगर मिला। विक्रमादित्य उस नगर के राजा के पास पहुंचा और एक लाख रूपये रोज पर उसके यहां नौकर हो गया। उसने वचन दिया कि जो काम और कोई नहीं कर सकेगा, उसे वह करेगा, उसे वह करेगा। एक बार की बात है कि उस नगर की राजा बहुत-सा सामान जहाज पर लादकर किसी देश को गया। विक्रमादित्य साथ में था। अचानक बड़े जोर का तूफान आया। राजा ने लंगर

डलवाकर जहाज खड़ा कर दिया। जब तुफान थम गया तो राजा ने लंगर उठाने को कहा, लेकिन लंगर उठा ही नहीं। इस पर राजा ने विक्रमादित्य से कहा, “अब तुम्हारी बारी है।” विक्रमादित्य नीचे उतरकर गया और भाग्य की बात कि उसके हाथ लगाते ही लंगर उठ गया, लेकिन उसके चढ़ने से पहले ही जहाज पानी और हवा की तेजी से चल पड़ा।

विक्रमादित्य बहते-बहते किनारे लगा। उसे एक नगर दिखाई दिया। ज्योहीं वह नगर में घुसा, देखता क्या है, चौखट पर लिखा है कि यहां की राजकुमारी सिंहवती का विवाह विक्रमादित्य के साथ होगा। राजा को बड़ा अचरज हुआ। वह महल में गया। अंदर सिंहवती पलंग पर सो रही थी। विक्रमादित्य वहीं बैठ गया। उसने उसे जगाया। वह उठ बैठी और विक्रमादित्य का हाथ पकड़कर दोनों सिंहासन पर जा बैठे।

उनका, विवाह हो गया।

उन्हें वहां रहते–रहते काफी दिन बीत गये। एक दिन विक्रमादित्य को अपने नगर लौटने क विचार आया और अस्तबल में से एक तेज घोड़ी लेकर रवाना हो गया। वह अवन्ती नगर पहुंचा। वहां नदी के किनारे एक साधु बैठा था। उसने राजा को फूलों की एक माला दी और कहा, “इसे पहनकर तुम जहां जाओंगे, तुम्हें फतह मिलेगी। दूसरे, इसे पहनकर तुम सबको देख सकोगे, तुम्हें कोई भी नही देख सकेगा।” उसने एक छड़ी भी दी। उसमें यह गुण था कि रात को सोने से पहले जो भी जड़ाऊ गहना उससे मांगा जाता, वही मिल जाता।

दोनों चीजों को लेकर राजा उज्जैन के पास पहुंचा। वहां उसे एक ब्राह्यण और एक भाट मिले। उन्होंने राजा से कहा, “हे राजन्! हम इतने दिनों से तुम्हारे द्वार पर सेवा कर रहे हैं, फिर भी हमें कुछ नहीं

मिला।” यह सुनकर राजा ने ब्राह्यण को छड़ी दे दी और भाट को माला। उनके गुण भी उन्हें बता दिये। इसके बाद राजा अपने महल में चला गया।

छ: महीने बीत चुके थे। सो वही दोनों आदमी आये, जिनमें पुरुषार्थ और भाग्य को लेकर झगड़ा हो रहा था। राजा ने उनकी बात का जवाब देते हुए कहा, “सुनो भाई, दुनिया में पुरुषार्थ के बिना कुछ नहीं हो सकता। लेकिन भाग्य भी बड़ा बली है।” दोनो की बात रह गई। वे खुशी-खुशी अपने अपने घर चले गये।

इतना कहकर पुतली बोली, “हे राजन्! तुम विक्रमादित्य जैसे तो सिंहासन पर बैठों।”

उस दिन का, मुहूर्त भी निकल गया। अगले दिन राजा सिंहासन की ओर बढ़ा तो कामकंदला नाम की छठी पुतली ने उसे रोक लिया। बोली, ” पहले मेरी बात सुनो।”

छठी पुतली रविभामा
छठी पुतली रविभामा ने जो कथा सुनाई वह इस प्रकार है-

एक दिन विक्रमादित्य नदी के तट पर बने हुए अपने महल से प्राकृतिक सौन्दर्य को निहार रहे थे। बरसात का महीना था, इसलिए नदी उफन रही थी और अत्यन्त तेज़ी से बह रही थी। इतने में उनकी नज़र एक पुरुष, एक स्री और एक बच्चे पर पड़ी। उनके वस्र तार-तार थे और चेहरे पीले। राजा देखते ही समझ गए ये बहुत ही निर्धन हैं। सहसा वे तीनों उस नदी में छलांग लगा गए। अगले ही पल प्राणों की रक्षा के लिए चिल्लाने लगे। विक्रम ने बिना एक पल गँवाए नदी में उनकी रक्षा के लिए छलांग लगा दी। अकेले तीनों को बचाना सम्भव नहीं था, इसलिए उन्होंने दोनों बेतालों का स्मरण किया। दोनों बेतालों ने स्री और बच्चे को तथा विक्रम ने उस पुरुष को डूबने से बचा लिया । तट पर पहुँचकर उन्होंने जानना चाहा वे आत्महत्या क्यों कर रहे थे। पुरुष ने बताया कि वह उन्हीं के राज्य का एक अत्यन्त निरधन ब्राह्मण है जो अपनी दरिद्रता से तंग आकर जान देना चाहता है। वह अपनी बीवी तथा बच्चे को भूख से मरता हुआ नहीं देख सकता और आत्महत्या के सिवा अपनी समस्या का कोई अन्त नहीं
नज़र आता।

इस राज्य के लोग इतने आत्मनिर्भर है#े कि सारा काम खुद ही करते हैं, इसलिए उसे कोई रोज़गार भी नहीं देता। विक्रम ने ब्राह्मण से कहा कि वह उनके अतिथिशाला में जब तक चाहे अपने परिवार के साथ रह सकता है तथा उसकी हर ज़रुरत पूरी की जाएगी। ब्राह्मण ने कहा कि रहने में तो कोई हर्ज नहीं है, लेकिन उसे डर है कि कुछ समय बाद आतिथ्य में कमी आ जाएगी और उसे अपमानित

होकर जाना पड़ेगा। विक्रम ने उसे विश्वास दिलाया कि ऐसी कोई बात नहीं होगी और उसे भगवान समझकर उसके साथ हमेशा अच्छा बर्ताव किया जाएगा। विक्रम के इस तरह विश्वास दिलाने पर ब्राह्मण परिवार अतिथिशाला में आकर रहने लगा। उसकी देख-रेख के लिए नौकर-चाकर नियुक्त कर दिए गए। वे मौज से रहते, अपनी मर्ज़ी से खाते-पीते और आरामदेह पलंग पर सोते। किसी चीज़ की उन्हें कमी नहीं थी। लेकिन वे सफ़ाई पर बिल्कुल ध्यान नहीं देते। जो कपड़े पहनते थे उन्हें कई दिनों तक नहीं बदलते। जहाँ सोते वहीं थूकते और मल-मूत्र त्याग भी कर देते। चारों तरफ गंदगी-ही गंदगी फैल गई।

दुर्गन्ध के मारे उनका स्थान एक पल भी ठहरने लायक नहीं रहा। नौकर-चाकर कुछ दिनों तक तो धीरज से सब कुछ सहते रहे लेकिन कब तक ऐसा चलता? राजा के कोप की भी उन्होंने पहवाह नहीं की और भाग खड़े हुए। राजा ने कई अन्य नौकर भेजे, पर सब के सब एक ही जैसे निकले। सबके लिए यह काम असंभव साबित हुआ। तब विक्रम ने खुद ही उनकी सेवा का बीड़ा उठाया। उठते-बैठते, सोते-जगते वे ब्राह्मण परिवार की हर इच्छा पूरी करते। दुर्गन्ध के मारे माथा फटा जाता, फिर भी कभी अपशब्द का व्यवहार नहीं करते। उनके कहने पर विक्रम उनके पाँव भी दबाते। ब्राह्मण परिवार ने हर सम्भव प्रयत्न किया कि विक्रम उनके आतित्थ से तंग आकर अतिथि-सत्कार भूल जाएँ और अभद्रता से पेश आएँ, मगर उनकी कोशिश असफल रही। बड़े सब्र से विक्रम उनकी सेवा में लगे रहे। कभी उन्हें शिकायत का कोई मौका नहीं दिया। एक दिन ब्राह्मण ने जैसे उनकी परीक्षा लेने की ठान ली। उसने राजा को कहा कि वे उसके शरीर पर लगी विष्ठा साफ करें तथा उसे अच्छी तरह नहला-धोकर साफ़ वस्र पहनाएँ।

विक्रम तुरन्त उसकी आज्ञा मानकर अपने हाथों से विष्ठा साफ करने को बढ़े। अचानक चमत्कार हुआ। ब्राह्मण के सारे गंदे वस्र गायब हो गए। उसके शरीर पर देवताओं द्वारा पहने जाने वाले वस्र आ गए। उसका मुख मण्डल तेज से प्रदीप्त हो गया। सारे शरीर से सुगन्ध निकलने लगी। विक्रम आश्चर्य चकित थे। तभी वह ब्राह्मण बोला कि दरअसल वह वरुण है। वरुण देव ने उनकी परीक्षा लेने के लिए यह रुप धरा था। विक्रम के अतिथि-सत्कार की प्रशंसा सुनकर वे सपरिवार यहाँ आओ थे। जैसा उन्होंने सुना था वैसा ही उन्होंने पाया, इसलिए विक्रम को उन्होंने वरदान दिया कि उसके राज्य में कभी भी अनावृष्टि नहीं होगी तथा वहाँ की ज़मीन से तीन-तीन फसलें निकलेंगी। विक्रम को वरदान देकर वे सपरिवार अन्तध्र्यान हो गए।

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sihasan battisi सिहासन बत्तीसी पहली किश्त
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