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मुहब्बतो का वो छोटा सा सिलसिला ही गया
वो अजनबी था मिरे शहर से चला ही गया

ज़रा सी देर को उसका ख्याल आया तो
वो रौशनी की तरह मुझमे फैलता ही गया

जो प्यास बन के मेरे जेहन में रहा बरसो
वो शख्स खुद मुझे दरियाओ से मिला ही गया

वो संग-संग था शीशे की आदतों वाला
मेरे करीब से गुजरा तो टूटता ही गया

मै जब भी कैस सफर के लिये रवाना हुआ
वो दूर तक मुझे रस्ते में देखता ही गया - सईद कैस
मायने
संग-संग=पत्थर जैसा
muhbbato ka wo chhota sa silsila hi gaya
wo ajnavbi tha mere shahar se chala hi gaya

jaraa si der ko uska khayaal aaya to
wo roshni ki tarah mujhme failta hi gaya

jo pyaas ban kar ke mere jehan me raha barso
wo shakhs khud mujhe dariyao se mila hi gaya

wo sang-sang tha shishe ki aadto wala
mere karib se gujra to tutta hi gaya

mai jab bhi kais safar ke liye rawana hua
wo door tak mujhe dekhta hi gaya- Saeed Kais
/ Said Kais

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