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नज़र-नवाज़ नजारा बदल न जाए कही
जरा-सी बात है मुह से निकल न जाए कही

वो देखते है तो लगता है नींव हिलती है
मेरे बयान को बंदिश न लग जाये कही

यो मुझको खुद पे बहुत एतबार है लेकिन
ये बर्फ आंच के आगे पिघल न जाए कही

चले हवा तो किवाडो की बंद कर लेना
ये गर्म राख शरारो में ढल न जाए कही

तमाम रात तेरे मैकदे में मय पी है
तमाम उम्र नशे में निकल न जाए कही

कभी मचान पे चढ़ने की आरजू उभरी
कभी ये डर की सीढ़ी फिसल न जाए कही

ये लोग होमो-हवन में यकीन रखते है
चलो, यहाँ से चले, हाथ जल न जाए कही- दुष्यंत कुमार
मायने
नज़र-नवाज=आँखों को आनंद देने वाली चीज, बंदिश=रोक, शरारे=चिंगारिया

Roman

nazar-nawaz nazara badal n jaye kahi
zara-si baat hai muh se nikal n jaye kahi

wo dekhte hai to lagta hai neev hilti hai
mere bayan ko bandish n lag jaye kahi

yo mujhko khud pe bahut etbar hai lekin
ye barf aanch ke aage pighal n jaye kahi

chale hawa to kiwado ko band kar lena
ye garm rakh shararo me dhal n jaye kahi

tamam ratat tere maikde me may pi hai
tamam umr nashe me nikal n jaye kahi

kabhi machan pe chadhne ki aarjoo ubhari
kabhi ye dar ki sidhi fisal n jaye kahi

ye log homo-hawan me yakeen rakhte hai
chalo, yaha se chale, hath n jal jaye kahi - Dushyant Kumar

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  1. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति आज के तेताला का आकर्षण बनी है
    तेताला पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
    अवगत कराइयेगा ।

    http://tetalaa.blogspot.com/

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  2. अच्छी रचना पढवाने के लिए आभार

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