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किसने भीगे हुए बालों से ये झटका पानी,
झूम कर आई घटा, टूट के बरसा पानी

कोई मतवाली घटा थी के जवानी की उमंग,
जी बहा ले गया बरसात का पहला पानी

टिकटिकी बांधे वो फिरते है में इस फ़िक्र में हूँ,
कही खाने लगे ना चक्कर ये गहरा पानी

बात करने में वो उन आँखों से अमृत टपका,
आरजू देखते ही मुहँ में भर आया पानी

रो लिया फूट के, सीने में जलन अब क्यूँ हो,
आग पिघला के निकला है ये जलता पानी

ये पसीना वही आंसूं हैं, जो पी जाते थे तुम,
"आरजू "लो वो खुला भेद वो फुटा पानी - आरज़ू लखनवी

Roman
Kisne bhige hue baalo se ye jhatka paani
jhum kar aayi ghata, tut ke barsa paani

koi matwali ghata thi ke jawani ki umang
ji baha le gaya barsat ka pahla paani

tiktiki bandhe wo firte hai mai is fikr me hu
kahi khaane lage na chakkar ye gahara paani

baat karne me wo un aankho se amrut tapka
aarju dekhte hi muh me bhar aaya paani

ro liya fut ke, seene me jalan ab kyu ho
aag pighla ke nikla hai ye jalta paani

ye pasina wahi aansu hai, jo pi jaate the tum
Aarzoo lo wo khula bhed wo futa paani - Aarzoo-Lakhnavi

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  1. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 22 -03 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.uchcharan.com/

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  2. अशरार दिल को छू गये……………शानदार गज़ल्।

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