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काश ऐसा कोई मंज़र होता
मेरे काँधे पे तेरा सर होता

जमा करता जो मै आये हुए संग
सर छुपाने के लिए घर होता

इस बुलंदी पे बहुत तनहा हु
काश मै सब के बराबर होता

उसने उलझा दिया दुनिया में मुझे
वरना एक और कलंदर होता - ताहिर फ़राज़



Roman

Kash aisa koi manzar hota
mere kandhe pe tera sar hota

jama karta jo mai aaye hue sang
sar chhupane ke liye ghar hota

is bulandi pe bahut tanha hu
kaash me sab ke barabar hota

usne uljha diya duniya me mujhe
warna ek aur kalandar hota - Tahir Faraz

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  1. इस बुलन्दी पर---- वाह बहुत खूबसूरत गज़ल है। धन्यवाद इसे पढवाने के लिये।

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