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दुनिया में हूँ दूनिया का तलबगार नहीं हू
बाज़ार से गुज़ारा हू खरीदार नहीं हू

जिंदा हू मगर जीस्त की लज्जत नहीं बाकी
हर चंद की हू होश में होशियार नहीं हू

इस खाना-ए-हस्ती से गुजर जाऊँगा बे-लौस
साया हू फकत नक्श-ए-दीवार नहीं हू

अफसुर्दा हू इबारत से दवा की नहीं हाजत
ग़म का मुझे ये जौफ है बीमार नहीं हू

वो गुल हू खिजा ने जिसे बर्बाद किया है
उलझु किसी दामन से में वो खार नही हू

यारब मुझे महफूज रख उस बुत के सितम से
में उस की इनायत का तलबगार नहीं हू

अफ्सुर्दगी-ओ-जौर की कुछ हद नहीं अकबर
काफ़िर के मुकाबिल में भी दीनदार नहीं हू- अकबर इलाहबादी / Akbar Ilahabadi/Alahabadi
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