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गए दिनों का सुराग लेकर किधर से आया, किधर गया वो
अजीब मानुस अजनबी था, मुझे तो हैरां कर गया वो

न अब वो यादो का चढ़ता दरिया, न फुर्सतो की उदास बरखा
यु ही ज़रा सी कसक दिल में, जो जख्म गहरा था भर गया वो

बस एक मंजिल है बुलहविस की, हजार रास्ते अहले-दिल के
यही तो फर्क मुझमे-उसमे, गुजार गया मै, ठहर गया वो

शिकस्ता-पा राह में खड़ा हू, गए दिनों को बुला रहा हू
जो काफिला मेरा हमसफ़र था, मिसाले-गर्द-सफ़र गया वो

वो रात का बे-नवा मुसाफिर, वो तेरा शायर वो तेरा नासिर
तेरी गली तक तो हमने देखा, फिर न जाने किधर गया वो
                                                   - नासिर काज़मी
मायने
मानुस=परिचित, बुलहविस=लौलुप, अहले-दिल=दिल वाले, शिकस्ता-पा=अपाहिज, निसहाय, मिसाले-गुर्दे-सफ़र=रास्ते की धुल की तरह, बे-नवा=कमजोर, जिसकी कोई आवाज न हो
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