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कब समाँ देखेंगे हम जख्मो के भर जाने का
नाम लेता ही नहीं वक़्त गुजार जाने का
जाने वो कौन है जो दामने-दिल खिचता है
जब कभी हमने इरादा किया मर जाने का
दस्तबरदार अभी तेरी तलब से हो जाये
कोई रास्ता भी तो हो लौट के घर जाने का
लाता हम तक भी कोई नींद से बोझल राते
आता हम को भी मजा ख्वाब में डर जाने का
सोचते ही रहे, पूछेंगे तिरी आँखों से
किस्से सिखा है हुनर दिल में उतर जाने का
                                          - शहरयार
मायने-
दस्तबरदार=अनिच्छुक, तलब=इच्छा

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  1. अच्छा संकलन बनाया है आपने, मैं गुलाम अली साहब की एक गुमनाम सी ग़ज़ल ढूढ़ रहा हूँ, पूरी ग़ज़ल भी ठीक से याद नहीं है, कुछ यूँ थी 'ज्यादा मत सोच, मर जाएगा...' अगर आप जुटा पाए तो बहुत अच्छा होगा !
    बढिया काम कर रहे है, जारी रखिये .. !

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