
परवीन शाकिर की लोकप्रिय ग़ज़लें (पुस्तक समीक्षा)
संपादक-डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफ़री ~ सूफिया नुसरत
परवीन शाकिर पाकिस्तान की लोकप्रिय शायरा रही हैं, लेकिन वह हिंदुस्तान में ही उतनी ही मशहूर हैं | उनका खानदान बिहार का था | देश के बंटवारे से पहले ही उनके पिता रोजगार की तलाश में करांची चले गए और फिर वहीं के होकर रह गए | जहां परवीन शाकिर की पैदाइश हुई |
खुशबू,सदबर्ग, कफ़े आईना, ख़ुद कलामी वगैरह उनके उर्दू के ग़ज़ल संग्रह हैं | डॉ.ज़ियाउर रहमान जाफ़री जो खुद एक शायर हैं, उन्होंने परवीन शाकिर की लोकप्रिय और चयनित ग़ज़लों का खूबसूरती के साथ हिंदी अनुवाद और संपादन किया है | जिसमें परवीन शाकिर की जिंदगी शायरी और उनके प्रेम व जुदाई पर एक महत्वपूर्ण भूमिका भी है | जो परवीन शाकिर को समझने में मदद करती है | जहां संपादक ज़ियाउर रहमान जाफरी ने बताया है कि परवीन पाकिस्तान की प्रशासनिक सेवा में थीं | उनकी खूबसूरती का भी कोई सानी नहीं था, लेकिन पति के दंभ से उनका शादीशुदा रिश्ता तलाक में बदल गया | उनकी ज़िन्दगी भी काफ़ी छोटी रही | 1952 में पैदा हुई परवीन 1994 में एक सड़क हादसे में इस दुनिया से रुखसत हो गईं | उनकी कब्र पर उनका यह शेर जिंदगी की हकीकत बयां कर रहा है-
मर भी जाऊं तो कहां लोग भूल ही देंगे
लफ्ज़ मेरे मेरे होने की गवाही देंगे
पाकिस्तान में पली -बढ़ी परवीन शाकिर की शायरी में कृष्ण और गोपियों के प्रेम का काफी जिक्र है -
ये हवा कैसे उड़ा ली गई आंचल मेरा
यों सताने की तो आदत मेरे घनश्याम की थी
या फिर-
हवा मेरे जूड़े में फूल सजाती जा
देख रही हूं अपने मनमोहन की राह
परवीन की पूरी शायरी हिंदुस्तानी भाषा के करीब है. उनकी शायरी में हर आशिक और माशूक की धड़कनें सुनाई देती हैं-
वो तो खुशबू है फिजाओं में बिखर जाएगा
मसअला फूल का है फूल किधर जाएगा
...........
मुझसे जितनी भी मोहब्बत करता
इक न इक रोज़ तो रुख़सत करता
इसी पुस्तक मेले में लोकार्पित हुई ये किताब पाठकों के द्वारा जिस तरह पसंद की जा रही है. वह परवीन की शायरी और उनके क़द को दिखलाता है.
..........
परवीन शाकिर की लोकप्रिय ग़ज़लें
संपादक - डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफ़री
मूल्य 300/-, पृष्ठ-80, वर्ष-2026
प्रकाशक- लिटिल वर्ल्ड पब्लिकेशन नई दिल्ली
-------------------------------
शरीफ़ कॉलोनी, बड़ी दरगाह,
पार नवादा, नवादा, बिहार
मोबाइल -+91 89359 50202
खुशबू,सदबर्ग, कफ़े आईना, ख़ुद कलामी वगैरह उनके उर्दू के ग़ज़ल संग्रह हैं | डॉ.ज़ियाउर रहमान जाफ़री जो खुद एक शायर हैं, उन्होंने परवीन शाकिर की लोकप्रिय और चयनित ग़ज़लों का खूबसूरती के साथ हिंदी अनुवाद और संपादन किया है | जिसमें परवीन शाकिर की जिंदगी शायरी और उनके प्रेम व जुदाई पर एक महत्वपूर्ण भूमिका भी है | जो परवीन शाकिर को समझने में मदद करती है | जहां संपादक ज़ियाउर रहमान जाफरी ने बताया है कि परवीन पाकिस्तान की प्रशासनिक सेवा में थीं | उनकी खूबसूरती का भी कोई सानी नहीं था, लेकिन पति के दंभ से उनका शादीशुदा रिश्ता तलाक में बदल गया | उनकी ज़िन्दगी भी काफ़ी छोटी रही | 1952 में पैदा हुई परवीन 1994 में एक सड़क हादसे में इस दुनिया से रुखसत हो गईं | उनकी कब्र पर उनका यह शेर जिंदगी की हकीकत बयां कर रहा है-
मर भी जाऊं तो कहां लोग भूल ही देंगे
लफ्ज़ मेरे मेरे होने की गवाही देंगे
पाकिस्तान में पली -बढ़ी परवीन शाकिर की शायरी में कृष्ण और गोपियों के प्रेम का काफी जिक्र है -
ये हवा कैसे उड़ा ली गई आंचल मेरा
यों सताने की तो आदत मेरे घनश्याम की थी
या फिर-
हवा मेरे जूड़े में फूल सजाती जा
देख रही हूं अपने मनमोहन की राह
परवीन की पूरी शायरी हिंदुस्तानी भाषा के करीब है. उनकी शायरी में हर आशिक और माशूक की धड़कनें सुनाई देती हैं-
वो तो खुशबू है फिजाओं में बिखर जाएगा
मसअला फूल का है फूल किधर जाएगा
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मुझसे जितनी भी मोहब्बत करता
इक न इक रोज़ तो रुख़सत करता
इसी पुस्तक मेले में लोकार्पित हुई ये किताब पाठकों के द्वारा जिस तरह पसंद की जा रही है. वह परवीन की शायरी और उनके क़द को दिखलाता है.
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परवीन शाकिर की लोकप्रिय ग़ज़लें
संपादक - डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफ़री
मूल्य 300/-, पृष्ठ-80, वर्ष-2026
प्रकाशक- लिटिल वर्ल्ड पब्लिकेशन नई दिल्ली
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शरीफ़ कॉलोनी, बड़ी दरगाह,
पार नवादा, नवादा, बिहार
मोबाइल -+91 89359 50202