बाबा जी ठुल्लू माइक - दिवाकर पांडेय चित्रगुप्त

बाबा जी ठुल्लू माइक

हमारे मोहल्ले के उस चौराहे पर, जहां चारों दिशाओं में सड़कें इस तरह फैलती हैं मानो कोई भैंस अपनी टांगे पसार कर बैठ गई हो, एक मंदिर ठूंसा हुआ है। मंदिर क्या, एक छोटा-सा ढांचा, जिसके ऊपर टीन की छत और चारों कोनों पर चार-चार माइक लटके हुए हैं, जैसे कोई राक्षस अपनी आठ जीभें लपलपाता फिरे। 

ये माइक दिन-रात, सुबह-शाम, बिना थके, बिना रुके, ऐसा तांडव मचाते हैं कि लगता है, भगवान गणेश स्वयं उतर आए हों और अपनी सूंड से ढोल बजा रहे हों।

उसकी शुरूआत होती है सुबह-सुबह उस पूं-पां से, जो कानों में ऐसा चुभता है जैसे कोई कील ठोक रहा हो। फिर धीरे-धीरे यह ध्वनि घों-घों में तब्दील हो जाती है, मानो कोई भारी-भरकम भैंस दलदल में फंसकर चीख रही हो।

अब इस मंदिर के पुजारी जी, जिनका नाम तो शायद रामलाल है, पर मोहल्ले वाले उन्हें 'माइक वाले बाबा' कहकर पुकारते हैं, उनकी भक्ति का आलम यह है कि वे भगवान को प्रसन्न करने के लिए लाउडस्पीकर को ही भगवान मान बैठे हैं। भजन-कीर्तन का ऐसा रेलम-पेल कि न बच्चे की परीक्षा की परवाह, न पड़ोस में किसी के मरने की खबर। मोहल्ले में कोई बच्चा किताब खोलकर बैठे, तो उसकी किताब के अक्षर इस कर्कश भोंपू के सामने नाचने लगें।

 कोई बेचारा बीमार पड़ा हो, तो उसकी नींद इस शोर में ऐसी उड़ती है जैसे कौआ किसी के हाथ में पत्थर देखकर उड़ता हो। 

और अगर, भगवान न करे, किसी के घर में कोई मृत्यु हो जाए, तो भी ये माइक वाले बाबा अपनी भक्ति में मस्त। "गणपति बप्पा मोरया" का राग ऐसा छेड़ते हैं कि लगता है, यमराज भी कानों में रुई ठूंसकर भाग खड़े हों।

मोहल्ले वालों ने कई बार गुहार लगाई। पहले तो विनम्रता से, फिर थोड़ा गुस्से में, और अंत में गाली-गलौज के साथ। पर बाबा का जवाब एक ही— "यह भगवान का काम है, भगवान को प्रसन्न करना है।" अब भगवान को प्रसन्न करने का यह तरीका कितना पवित्र है, यह तो वही जाने, पर इतना जरूर है कि मोहल्ले का हर प्राणी इस भक्ति से त्रस्त है। 

एक बार तो मास्टरजी, जो पास के स्कूल में पढ़ाते हैं और जिनका लड़का बारहवीं की बोर्ड परीक्षा दे रहा था, बाबा के पास पहुंचे। बोले, "बाबाजी, थोड़ा धीमा कर दीजिए, बच्चे का भविष्य दांव पर है।" बाबा ने एक ठंडी सांस ली और कहा, "मास्टरजी, भगवान के भजन से भविष्य बनता है, बिगड़ता नहीं।" मास्टरजी का चेहरा लाल हो गया, पर क्या करें? मोहल्ले की एकता का आलम यह है कि अगर कोई आवाज उठाए, तो बाकी लोग कहते हैं, "रहने दो, धार्मिक मामला है, छेड़ो मत।"

और फिर ये भजन भी कोई मधुर राग नहीं। कोई भैरवी या मालकौंस नहीं। ये तो वही घिसा-पिटा, भोंडा-सा गाना, जो किसी सस्ते कैसेट में रिकॉर्ड किया गया हो। आवाज ऐसी कि लगता है, गायक ने गाना गाने से पहले भांग पी थी और माइक में चिल्लाकर अपनी भड़ास निकाल रहा था। गीत के बोल भी कुछ ऐसे कि "गणपति बप्पा मोरया" के बाद कुछ समझ ही न आए। पर बाबा को इससे क्या? उनके लिए भक्ति का मतलब है—जितना शोर, उतनी भगवान की कृपा।

अब इस तमाशे में एक और मजा यह कि मंदिर के पास ही एक चाय की दुकान है, जहां मोहल्ले के तमाम बेकार लोग जमा होते हैं। ये लोग इस शोर को अपनी जिंदगी का बैकग्राउंड म्यूजिक मान चुके हैं। चाय की चुस्कियों के बीच ये तर्क करते हैं कि "बाबा की भक्ति में दम है, मोहल्ले की सारी बलाएं टल रही हैं।" कोई पूछे कि बलाएं टल रही हैं तो फिर पिछले महीने रामू की साइकिल चोरी कैसे हो गई? तो जवाब मिलता है, "अरे, ये छोटी-मोटी बातें तो चलती रहती हैं।"इस तरह, मंदिर के माइक और बाबा की भक्ति ने पूरे मोहल्ले को एक ऐसे राग में बांध रखा है, जहां न सुकून है, न शांति। बच्चे फेल हो रहे हैं, बूढ़े बीमार पड़ रहे हैं, और नवजवान चाय की दुकान पर बैठकर भक्ति का गुणगान कर रहे हैं। 

और ऊपर से बाबा का वह दावा— "यह सब भगवान की माया है।" अब इस माया का क्या करें, यह तो कोई बता नहीं सकता। बस, कानों में रुई ठूंसकर जीने की आदत डाल लो, क्योंकि माइक वाले बाबा और उनके भोंपू का तांडव अभी थमने वाला नहीं।

- दिवाकर पांडेय चित्रगुप्त
बहराइच उत्तर प्रदेश
बाबा जी ठुल्लू माइक - दिवाकर पांडेय चित्रगुप्त

Post a Comment

कृपया स्पेम न करे |

Previous Post Next Post

Advertisement

preload preload preload preload preload