
मुनव्वर राना को याद करते हुए
14 जनवरी की देर रात उर्दू के मशहूर शायर मुनव्वर राना का निधन दिल का दौरा पड़ने से हो गया | 26 नवंबर 1952 को बरेली में पैदा हुए राना की उम्र 71 साल की थी | वह पिछले कुछ दिनों से लखनऊ के एक निजी अस्पताल में भर्ती थे | उनके परिवार में उनकी पत्नी चार बेटियां और एक बेटा है |
मुनव्वर राना पूरी दुनिया में मां पर शायरी के लिए जाने जाते हैं-
किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई
मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से में मां आई
यह उनका वह शेर है जिससे राना पूरी दुनिया में रातों- रात मशहूर हो गए | उनके कई शेर लोगों की जुबां पर जिंदा हैं | हर तरह की महफिल में उनके लिखे हुए शेर मिल जाते हैं | उनके बहुत सारे अशआर ऐसे हैं जिसमें मृत्यु का वर्णन अमरता के साथ दिखलाई देता है, पर ऐसे समय में भी मां उनकी ताकत हिम्मत और भरोसा बनकर सामने आती है -
अभी जिंदा है मेरी मां मुझे कुछ भी नहीं होगा
मैं जब घर से निकलता हूं दुआ भी साथ चलती है
शाहदाबा के लिए 2014 में उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला | गजल गांव,पीपल छांव,बदन सराय आदि उनकी प्रसिद्ध कृतियों है | वह ग़ालिब अवार्ड से भी 2005 में नवाज़े गए थे |
मुनव्वर राना का विवादों से भी बड़ा गहरा रिश्ता रहा | कभी वह साहित्य अकादमी अवॉर्ड लौटाने को लेकर चर्चा में रहे तो कभी संसद भवन को गिराकर खेत बना देने की बात लोगों को नागवार लगी | उनकी जिन्ना और पलायन वाद की बात को भी कुछ ज्यादा तूल दिया गया |
बाहर कैफ इसमें कोई दो राय नहीं कि वह गजल के मायनाज़ शायर थे | उनकी शायरी एक बड़े ख़ित्ते को पसंद आती थी | कोई भी कामयाब मुशायरा उनके बिना नहीं होता था | उनकी निजामत भी आला पैमाने की थी | लगातार बीमार रहने के बावजूद भी उनकी शायरी से निस्बत बनी रही |
उर्दू हिंदी को पूरी दुनिया में पहचान उनकी शायरी से मिली | उन्होंने गजल को एक पहचान दी गजल को महबूबा की गली से निकाल कर मां के कदमों तक पहुंचाया | उन्होंने मजदूरों के हक की बात की | सियासत के दोहरे चरित्र पर प्रश्न उठाए | उनकी संजीदा शायरी सुनने के लिए लोगों की एक हुजूम बनी होती थी |
यह भी अजब इत्तेफाक है कि जब उनकी मृत्यु हुई तो उन्होंने अपनी आखिरी सांस अदब की नगरी लखनऊ में ली | मुनव्वर राना अपनी जिंदगी में भी क़ब्र, दर्द और मिट्टी से प्यार के रिश्ते लिखते रहे | उन्होंने कहा-
मिट्टी में मिला दे कि जुदा हो नहीं सकता
अब इससे ज्यादा मैं तेरा हो नहीं सकता
जिस्म पर मिट्टी मिलेंगे पाक हो जाएंगे हम
ए ज़मीं इक दिन तेरी खुराक हो जाएंगे हम
जब कभी मां, मोहब्बत और मयार की बात होगी मुनव्वर राना का नाम इज्जत के साथ लिया जाएगा |
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डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफरी
ग्राम /पोस्ट -माफ़ी, वाया -अस्थावां, ज़िला -नालंदा, बिहार 803107
Mob. : 9934847941
मुनव्वर राना पूरी दुनिया में मां पर शायरी के लिए जाने जाते हैं-
किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई
मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से में मां आई
यह उनका वह शेर है जिससे राना पूरी दुनिया में रातों- रात मशहूर हो गए | उनके कई शेर लोगों की जुबां पर जिंदा हैं | हर तरह की महफिल में उनके लिखे हुए शेर मिल जाते हैं | उनके बहुत सारे अशआर ऐसे हैं जिसमें मृत्यु का वर्णन अमरता के साथ दिखलाई देता है, पर ऐसे समय में भी मां उनकी ताकत हिम्मत और भरोसा बनकर सामने आती है -
अभी जिंदा है मेरी मां मुझे कुछ भी नहीं होगा
मैं जब घर से निकलता हूं दुआ भी साथ चलती है
शाहदाबा के लिए 2014 में उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला | गजल गांव,पीपल छांव,बदन सराय आदि उनकी प्रसिद्ध कृतियों है | वह ग़ालिब अवार्ड से भी 2005 में नवाज़े गए थे |
मुनव्वर राना का विवादों से भी बड़ा गहरा रिश्ता रहा | कभी वह साहित्य अकादमी अवॉर्ड लौटाने को लेकर चर्चा में रहे तो कभी संसद भवन को गिराकर खेत बना देने की बात लोगों को नागवार लगी | उनकी जिन्ना और पलायन वाद की बात को भी कुछ ज्यादा तूल दिया गया |
बाहर कैफ इसमें कोई दो राय नहीं कि वह गजल के मायनाज़ शायर थे | उनकी शायरी एक बड़े ख़ित्ते को पसंद आती थी | कोई भी कामयाब मुशायरा उनके बिना नहीं होता था | उनकी निजामत भी आला पैमाने की थी | लगातार बीमार रहने के बावजूद भी उनकी शायरी से निस्बत बनी रही |
उर्दू हिंदी को पूरी दुनिया में पहचान उनकी शायरी से मिली | उन्होंने गजल को एक पहचान दी गजल को महबूबा की गली से निकाल कर मां के कदमों तक पहुंचाया | उन्होंने मजदूरों के हक की बात की | सियासत के दोहरे चरित्र पर प्रश्न उठाए | उनकी संजीदा शायरी सुनने के लिए लोगों की एक हुजूम बनी होती थी |
यह भी अजब इत्तेफाक है कि जब उनकी मृत्यु हुई तो उन्होंने अपनी आखिरी सांस अदब की नगरी लखनऊ में ली | मुनव्वर राना अपनी जिंदगी में भी क़ब्र, दर्द और मिट्टी से प्यार के रिश्ते लिखते रहे | उन्होंने कहा-
मिट्टी में मिला दे कि जुदा हो नहीं सकता
अब इससे ज्यादा मैं तेरा हो नहीं सकता
जिस्म पर मिट्टी मिलेंगे पाक हो जाएंगे हम
ए ज़मीं इक दिन तेरी खुराक हो जाएंगे हम
जब कभी मां, मोहब्बत और मयार की बात होगी मुनव्वर राना का नाम इज्जत के साथ लिया जाएगा |
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डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफरी
ग्राम /पोस्ट -माफ़ी, वाया -अस्थावां, ज़िला -नालंदा, बिहार 803107
Mob. : 9934847941