लोकतंत्र में छा गए, मुद्दे बेबुनियाद (50 दोहे) - देवेश दीक्षित देव

50 दोहे - देवेश दीक्षित देव


1.
लोकतंत्र में छा गए, मुद्दे बेबुनियाद।
संसद में जबसे हुए,अर्थहीन संवाद।।

2.
नागफ़नी-से आचरण, कीकर-से जज़्बात।
भाषण में वो कर रहे, आदर्शो की बात।।

3.
विकसित होता किस तरह, अपना हिंदुस्तान
सरकारें ही खा गयीं, सरकारी अनुदान।।

4.
श्रद्धा,निष्ठा,सत्य को, मिला न कोई ठौर।
झूठ कपट इस दौर में, बने रहे सिरमौर।।

5.
अंधी, बहरी लालची, स्वारथ से बदहाल।
राजनीति की आँख में, मिला सुअर का बाल।।

6.
जन्मजात जिनके रहे, दूषित सोच-विचार।
आज वहीं सिखला रहे, हमको शिष्टाचार।।

7.
तिरस्कार,धोखा, घृणा भेदभाव अपमान।
इससे ज़्यादा और क्या, दिया हमें श्रीमान।।

8.
आते हम सबको नज़र, पाँच साल के बाद।
महज़ चुनावों के समय, किए गए हम याद।।

9.
चोरी,झगड़े,हादसे, ठगी लूट पर व्यभिचार।
क्या-क्या लेकर आ गया, सुबह एक अख़बार।।

10.
दिन दूनी कर लीजिए, रात चौगुनी आय।
राजनीति से वृहत कुछ,और नहीं व्यवसाय।।

11.
नई सदी का देखिए,अपना भारतवर्ष।
जिसे गर्त में ले गया, सत्ता का संघर्ष।।

12.
छल कपटी के भाग्य में, बनें सुखद संयोग
रहे हाशिए पर सदा, दिल के सच्चे लोग।।

13.
बाज़ारों के इस तरह, बदले आज नक्षत्र।
खोटे सिक्के चल रहे, यत्र तत्र सर्वत्र।।

14.
मेरी ही कमियाँ सदा, केवल तू मत आँक।
ख़ुद भी अपने आपका, कभी गिरेबाँ झाँक।।

15.
दरबारों का आजकल, यूँ बदला परिवेश।
काकवंश देने लगे, हंसों को उपदेश।।

16.
कुछ दिन भी जिनके रहे, फूलों से संबंध।
उनके हाथों से सदा, आती रही सुगंध।।

17.
अभ्यर्पण करती नदी, देती नहीं दलील।
सागर से मिलकर हुई, सागर में तब्दील।।

18.
हल्के में मत लीजिए, समझो नहीं उपास्त्र।
शब्द-शब्द हैं उपनिषद्, शब्द-शब्द ब्रह्मास्त्र।।

19.
क्या समझूँ सौभाग्य अब, क्या समझूँ दुर्भाग्य।
मन चिंतन में आ बसा, जब ख़ुद ही वैराग्य।।

20.
जिसने भी अपना यहाँ, दोहरा जिया चरित्र।
निश्चित ही सब खो दिए, उसने अपने मित्र।।

21.
उसको भाये किस तरह, कोई अच्छी बात
जिसने गिरवीं रख दिए, दिल के सब जज़्बात।।

22.
दिल के दिल से इसलिए, मिले नहीं जज़्बात।
तुम पूनम का चाँद थे, हम मावस की रात।।

23.
तुमने पढ़ कर ही नहीं, देखा कभी जनाब।
अपना तो दिल यूँ रहा, जैसे खुली किताब।।

24.
कविताओं से इस तरह, अपना रहा प्रसंग।
पढ़ते-पढ़ते आ गया, लिखने का कुछ ढंग।।

25.
तन रूपी जब से मिला, हमको एक मकान।
श्वास-श्वास के रूप में, देना पड़ा लगान।।

26.
घट-घट वासी राम को, क्यों न हुआ आभास।
पुनः पुनः किस दोष में सीता को वनवास।।

27.
रोक न पाए स्वयं को, सुन शबरी की टेर।
बड़े चाव से खा गए, राघव झूठे बेर।।

28.
नहीं किया होता अगर, बन-बन में संग्राम।
राम ने बनते राम से, पुरुषोत्तम श्रीराम।।

29.
कोई ऐसी दे गया, दर्द भरी सौग़ात।
पत्थर जैसे हो गये, दिल के सब जज़्बात।।

30.
किसने छोड़ा शौक से, ख़ुद अपना घरबार।
भूख पेट के लिए गयी, सात समंदर पार।।

31.
बरसा बादल आज यूँ, पुरवाई के संग।
.पानी-पानी हो गये,धरती के सब अंग।।

31.
सुध-बुध सारी छोड़ कर, दौड़ा रेलमपेल
बादल को जिस पल मिला, धरती का ईमेल।।

32.
नदियाँ पहले दूध की जहाँ बहीं स्वच्छंद।
उसी देश में बिक रहा पानी बोतलबंद।।

33.
भरा रहा मन में सदा, जिनके भोग विलास।
पढ़ा रहे हैं योग का, आज वही इतिहास।।

34.
आत्ममुग्धता का लगा,जाने कैसा रोग।
पंजों के बल चल रहे, क़द के बौने लोग।।

35.
क़दम-क़दम ताने मिले,क़दम-क़दम अपमान।
मीरा की तक़दीर में, हर युग है विषपान।।

36.
छोड़ा मुझको इस तरह, उसने अबकी बार।
जैसे कोई छोड़ दे, पढ़ा हुआ अख़बार।।

37.
पता नहीं कुछ भी चला, ना जाने किस मोड़।
हमें सफ़र में कब कहाँ, गया बचपना छोड़।।

38.
धरती ने कुछ शाम को, कह दी ऐसी बात।
बादल के बहते रहे, आँसू सारी रात।।

39.
एक अबीरी-सी छुअन, ने रंग दिए दिगंत।
देह फागुनी हो गयी, मन हो गया वसंत।।

40.
नए साल के हाथ में देकर मेरा हाथ।
एक पुराने साल ने, छोड़ दिया है साथ।।

41.
वर्ष पुराना दे गया, हमें यही पैग़ाम।
समय कभी रुकता नहीं, चलता है अविराम।।

42.
सभी मनोरथ पूर्ण हो, खुशियाँ करें निहाल।
हर पल शुभ हो आपको, उम्मीदों का साल।।

43.
यश,वैभव,सम्मान में, नित-नित हो उत्कर्ष।
आप सभी को हो बहुत, मंगलमय नववर्ष।।

44.
जिनके लेखन में मिली कुण्ठा, घुटन, प्रमाद।
समझ रहे वह स्वयं को, दिनकर,पंत,प्रसाद।।

45.
या समझो कमज़ोरियाँ, या फिर कोई भूल।
हमने मंचों के लिए, तोड़े नहीं उसूल।।

46.
नन्हें हाथों से जिन्हें, छूना था आकाश।
बस्तों के बोझा तले बचपन रहे तलाश।।

47.
शीत, ग्रीष्म बरसात में, चलती रही अधीर।
सागर ने समझी नहीं, कभी नदी की पीर।।

48.
कल तक जो दीपक लड़े, तूफानों से जंग।
घूम रहे हैं आजकल,अँधियारों के संग।।

49.
बरस रहे हैं झील पर,बादल बारह मास ।
सहराओं में हर तरफ़, भटक रही है प्यास।।

50.
घर की बातें आ गयीं, चौराहों की ओर।
कितनी नाज़ुक हो गयी, संबंधों की डोर।।
देवेश दीक्षित देव

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