कहावतों का चक्कर (व्यंग्य) - हरिशंकर परसाई | जखीरा, साहित्य संग्रह

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कहावतों का चक्कर (व्यंग्य) - हरिशंकर परसाई

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कहावतों का चक्कर (व्यंग्य) - हरिशंकर परसाई जब मैं हाईस्कूल में पढता था, तब हमारे अंग्रेजी के शिक्षक को कहावतें और सुभाषित रटवाने की बड़ी धुन थी ।

कहावतों का चक्कर (व्यंग्य) - हरिशंकर परसाई

जब मैं हाईस्कूल में पढता था, तब हमारे अंग्रेजी के शिक्षक को कहावतें और सुभाषित रटवाने की बड़ी धुन थी । सैकड़ों अंग्रेजी कहावतें उन्होंने हमे रटवाई और उनका विश्वास था की यदि हमने नीति वाक्य रट लिए, तो हमारी जिंदगी जरूर सुधर जायेगी । हमारी जिंदगी सुधरी या बिगड़ी, इसका निर्णय करने का समय अभी नहीं आया, पर हमारे कहावत प्रेमी शिक्षक 'ऑनेस्टी इस द बेस्ट पालिसी ' रटवाते -रटवाते एक बार लड़कों की फीस खा गए और बर्खास्त कर दिए गए।

उनके रटाये उन सैकड़ों सुभाषितों, कहावतों और नीति वाक्यों में से कई के बारे में तब से अभी तक कई शंकाएं उठती रही हैं ।एक कहावत है --'लुक बिफोर यू लीप ', याने कूदने के पहले देख लो । मैं तभी सोचता था कि जो कूदने के पहले देख लेगा, वह क्या ख़ाक कूदेगा ? उसकी हिम्मत भी होगी? जिसे कूदना है, उसे बिना देखे ही कूद जाना चाहिए ---'लीप बिफोर यू लुक!'एक और कहावत रटाई गयी थी --'ए मैन इज़ नोन बाई द कंपनी ही कीप्स ' कहावत ठीक है। पर पीछे हमने ऐसे कई आदमी देखे जिनकी पत्नियां अनेक उल्लेखनीय और गोपनीय कारणों से चर्चा का विषय बन जाती हैं । एक ऐसे जोड़े को नजदीक से जानते थे ।

पत्नी कितनी ही समितियों में जाती, भाषण देती और खूब नाम कमाती। पति महाशय को पहले कोई नहीं जानता था, पर अब तो सभी जानने लगे --'फलां देवी के पति यही हैं।' तब हमे लगा ज्यादा ठीक कहावत यों होगी ---' ए मैन इज़ नोन बाई द वाइफ ही कीप्स !' एक और कहावत रटी थी --- 'ब्लड इज़ थिकर दैन वाटर ।' पिछले साल की बात है । एक सज्जन बड़े पूर्ण- कंठ (फुल थ्रोटेड ) मार्क्सवादी थे ।होटलों में बैठकर युवकों को द्वंद्वात्मक भौतिकवाद समझाते थे । एक चुनाव में उनके बड़े भाई जनसंघ कि और से चुनाव के लिए खड़े हुए ।हमारे मार्क्सवादी भाई उम्मीदवार को छोड़कर प्रतिक्रियावादी भाई का प्रचार करने लगे । लोग हैरत में। कहते, --'बड़ा आश्चर्य है! यह तो मार्क्सवादी था।' हम समझ गए, ' ब्लड इज़ थिकर दैन मार्क्सिस्म ।'

एक सुभाषित जिसने अभी तक परेशान किया, वह है ---' लव दाई नेबर '--- अपने पडोसी को प्यार करो ।अच्छी बात है । करेंगे ।पर क्यों ? हर पडोसी को प्यार क्यों करें ? यह हमारा पडोसी हमारे द्वार के सामने कचरा फैंकता है, उसे तो हम प्यार करें । और हमसे चौथे मकान में तहसीलदार का मुंशी रहता है । गौ आदमी है ' उसे प्यार क्यों नहीं करें?ऐसे ही प्रश्न तब मेरे बाल मन में उठते थे । परेशान था कि आखिर इस सुभाषित का प्रयोजन क्या है ? मेरे पड़ोस में मेरा सहपाठी प्रकाशचंद्र रहता था । वह गणित में बहुत होशियार था और में गणित में बहुत बुध्दू, क्योंकि मुझे तो लेखक के व्यर्थत्व संस्कार डालने थे । प्रकाश मुझे गणित के पर्चे में नक़ल कराता था । मुझे यह समझ में आया कि सुभाषित में पडोसी को प्यार करने कि सलाह इसलिए दी गयी है कि यदि पडोसी गणित में होशियार हुआ और तुम कमजोर हुए, तो वह तुम्हे नक़ल करायेगा ।

फिर एक दिन अचानक यह सुभाषित मेरी नज़र से गिर गया । उस दिन सुना कि गणेश बाबू पिट गए । बड़ों कि बातों से जाना कि वे पड़ोस में रहने वाली एक स्त्री से प्यार करने लगे थे । आज दोपहरी में वे उसकी हथेली अपने हाथ में लेकर उसका भाग्य पढ़ रहे थे कि इतने में उनका ही भाग्य-निर्णय हो गया । उसके भाई ने देख लिया, बाप को पुकारा और बाप बेटे ने गणेश बाबू को पीटा ।

बेचारे गणेश बाबू ने इस महान सुभाषित के अनुसार ही काम किया था । 'नेबर' का अर्थ पडोसी भी होता है और पड़ोसिन भी । गणेश बाबू ने 'नेबर' को प्यार किया । क्या गुनाह किया ? फिर पिटे क्यों? सोचा, यह सुभाषित ही झूठा है । कहना यह चाहिए कि पडोसी को चाहे करो, पर 'पड़ोसिन' से प्यार मत करो, नहीं तो किसी दिन उसके बाप भाई तुम्हारी मरम्मत कर देंगे । पता नहीं किसने, पडोसी को प्यार करने का यह सुभाषित गणेश बाबू जैसे भोले आदमियों को मुसीबत में डालने के लिए बना दिया ।

सुभाषित का सच्चा प्रयोजन तब भी मेरी समझ में नहीं आया था । सत्य देश -काल सापेक्ष तो होता ही है, अवस्था सापेक्ष भी होता है । मेरी अवस्था ज्यों ज्यों बढ़ने लगी, त्यों त्यों सत्य के नवीन-नवीन स्तर उभरने लगे । कॉलेज में पढता था, तब पिताजी ने मकान बदला ।बदलने कि क्रिया में एक कहावत और झूठी पड़ी । कहा है -'टाइम इज़ मनी ', समय ही धन है । पिताजी के पास समय ही समय था । धंधा बंद हो गया था इसलिए समय खूब था, काटे नहीं कटता था। पर 'मनी' धीरे धीरे कम होता गया और आखिर हमारा निजी मकान बिका और हम किराए के मकान मे आये । पिताजी का टाइम 'मनी' बना ही नहीं, 'मनी' का दुश्मन ही बन गया । हमारे पड़ोस में एक तरुणी रहती थी -- सुंदरी थी और ध्यानदेनेवाली थी । स्त्रियां दो प्रकार कि होती हैं --- ध्यान देने वाली और न ध्यान देने वाली । अगर आप किसी परीक्षा कि तैयारी कर रहें हैं तो नतीजा इस बात पर निर्भर है कि आपके पड़ोस में ध्यान देने वाली रहती है या ध्यान न देने वाली । मेरा रिजल्ट तो उसी दिन खुल गया जिस दिन मैंने देखा कि पड़ोसिन ध्यान देनेवाली है । मैंने अंग्रेजी, दर्शन, अर्थशास्त्र सब उसे समर्पित कर दिए और जब फ़ैल हुआ, तब होश आया कि मैं कहावत के चक्कर में आ गया । पर कहावत का क्या दोष ?अगर 'नेबर' सुन्दर है, तो बिना कहावत जाने भी उससे प्यार करना ही होगा । तो क्या यह सुभाषित कुरूपाओं के लिए प्रेमी कि व्यवस्था करने के प्रयोजन से बनाया गया है?

मैंने कहा था कि अवस्था ज्यों ज्यों बढ़ी, त्यों त्यों सत्य के नए स्तर खुलने लगे और 'पडोसी से प्यार करो' में मुझे नए नए प्रयोजन दिखने लगे ।
लगभग दो साल पहले मैंने फिर मकान बदला । वहां आने के दूसरे ही दिन मैं बरामदे में बैठा सुबह का अखबार पढ़ रहा था कि इतने में बड़ी चौड़ी मुस्कान धारण किये पडोसी आये । बोले, "नमस्कार ! आ गए ! बड़ा भाग्य है हमारा, जो आपके पड़ोस का सौभाग्य प्राप्त हुआ । कहा है --

एक घडी आधी घडी, आधी में पुनि आध ।
तुलसी संगत साधू की, हरै कोटि अपराध ।।"

मैं सोचने लगा साधू कौन है मैं या वे । मैंने एक-दो नम्रतासूचक वाक्य कहे। फिर मौन । फिर मैंने कहा की आज मौसम अच्छा है, कल ख़राब था, शायद कल और अच्छा रहे । फिर मौन । तब मैंने कहा यद्यपि मकान में कुछ असुविधाएं हैं, फिर भी सुविधाएं हैं । सामने मैदान नहीं है, पर मैदान भी किस काम का? खिड़कियां कम हैं, पर ज्यादा खिड़कियां होना भी ठीक नहीं ! वे 'जी हाँ ' कहकर सहमति जतलाते गए । फिर हम मौन ! इस बार मौन तोडा । बोले, " और क्या समाचार है?"
सब ठीक है। मैंने कहा ।
वे अखबार की ओर देखते हुए बोले, "वीटो तो हो गया ।"
मैं मकान और मौसम की बात से एकदम अंतर्राष्ट्रीय राजनीति पर कूद पड़ने को तैयार नहीं था । पूछा "कैसा वीटो?"
वे बोले, " सुरक्षा परिषद में कश्मीर सम्बन्धी प्रस्ताव को रूस ने वीटो कर दिया न ।"
मैंने कहा, "हाँ-हाँ, कल के अखबार में पढ़ा था ।"

वे बोले, "हाँ, डिटेल्स आज के अखबार में होंगे । यह आज का ही अखबार है न? देखूं जरा ।" मेरे हाथ से उन्होंने अखबार ले लिया और बोले, "अच्छा आप 'फ्री प्रेस' लेतें हैं ।' इट इज़ अ ग्रेट पेपर '। मैं पहले इसी को लेता था ।"उन्होंने उसे जरा देर उल्टा पलटा और सहसा उठकर खड़े हो गए । बोले, "अभी घंटे भर में लौटा दूंगा।" और अखबार लेकर चल दिए ।
वे रोज़ सबेरे फ़रिश्ते की तरह मुस्कुराते हुए आते और नमस्कार करके पिछले दिन के समाचार का कोई प्रसंग उठा देते --
और क्या समाचार है?
सब ठीक है।
मोहम्मद अली तो हटा दिए गए!
हाँ कल पढ़ा तो था ।
अब क्या हो रहा है पाकिस्तान में? आज के अखबार में होगा शायद । ये आज ही का है न ! अभी घंटे भर में लौटता हूँ ।
कभी कहते --
टीटो तो आ गए ।
हाँ, परसों दिल्ली पहुंचे ।
पंडितजी से बातें हो रही होंगी । आज तो अखबार में आया होगा । देखूं ज़रा । अभी घंटे भर में भेजता हूँ ।
बीच में मैंने 'फ्री प्रेस' बंद करके 'अमृत बाजार पत्रिका' लेना शुरू कर दिया। उन्होंने देखा तो बोले, "अरे आप 'पत्रिका' लेने लगे। वाह ! इट इज़ अ ग्रेट पेपर ! मैं पहले इसी को लेता था ।"

वे मुझे बेहद प्यार करते थे । सबेरे मुस्कुराते हुए आते, प्रेम से मेरा हाल - चाल पूछते, दो घडी बैठते ! वे धीरे -धीरे मरी झंझटें कम करते गए। अब वे अखबारवाले को रोकर पहले ही अखबार ले लेते और फिर पढ़कर मेरे पास लाते और बतला देते क्या क्या ख़ास बात पढ़ने लायक है । इस तरह व्यर्थ का बहुत सा पढ़ने से मुझे बचा लेते। कभी-कभी उनके बच्चे भी अपने ढंग से अखबार पढ़ डालते ; तब वे मेरे पास आकर कहते, "स्साले बच्चों ने अखबार फाड़ डाला ।मेरी तो नाक में दम है । खैर कोई ख़ास बात नहीं थी। मुख्य समाचार ये थे --।" वे समाचार सुना जाते । इस तरह मुझे पढ़ने का परिश्रम नहीं करना पड़ता । फिर वे शाम को अखबार दुबारा बुलाने लगे। फिर यह सोचकर कि पुराने बेकार अखबार को वापिस करके मेरे छोटे कमरे क्यों कचरा जमा करूँ, वे अखबार अपने ही घर रखते जाते । जब काफी अखबार जमा हो जाते, तो वे बेचारे खुद कबाड़ी को बेच देते और यह सोचकर कि मुझ साधू को माया में फ़साना ठीक नहीं, पैसा भी खुद ही रख लेते ।

मैं दो साल उनका पडोसी रहा । इस अवधि में मेरे सामने उस सुभाषित 'लव दाई नेबर' का एक और नया प्रयोजन खुला -- पडोसी को क्यों प्यार करें? इसलिए कि उसका अखबार मांगकर पढ़ सके और उसकी रद्दी बेच सकें । जिस महापुरुष ने इस सुभाषित को बनाया वह महान भविष्यदृष्टा रहा होगा । वह जानता था, आगे चलकर अखबार निकालेंगे और तब पडोसी का अखबार पढ़ने का प्रसंग उपस्थित होगा । उस समय यह सुभाषित मानवता के काम आएगा ।

वैसे अखबार माँगनेवालों से दुनिया अच्छा सुलूक नहीं करती । उन प्रेमी आत्माओं से चिढ़ती है । पर मेरा विश्वास है कि अखबार मांगनेवाले पडोसी से बढ़कर आपका शुभचिंतक दूसरा नहीं । वह आपके दीर्घ जीवन की कामना करता है, जिससे वह आजीवन आपका अखबार पढ़ सके । वह आपसे पहले संसार से विदा होना चाहता है, ताकि वह एक दिन भी बिना अखबार पढ़े इस दुनिया में न जिए । मेरा विश्वास है कि लम्बी उम्र के लोगों के जीवन का अध्ययन किया जाए, तो मालूम होगा कि पड़ोसियों को अखबार देने वाले लोग ही लम्बी उम्र पाते हैं ।

अखबार मांग लेना और उसे रखे रहना कोई अनैतिक काम नहीं है । असल में इन चीज़ों के नैतिकता दूसरे किस्म की होती है जिसे ए.जी . गार्डनर ने 'अम्ब्रेला मॉरल्स ' कहा है । 'छाते की नैतिकता ' यह है कि पानी गिरते में आप अपने दोस्त का छाता ले गए और फिर लौटाया नहीं, तो यह हड़पना नहीं हुआ। आप लौटना भूल गए। बस ! किसी की पुस्तक मांगकर पढ़ने के बाद हम उसे लौटते नहीं हैं । हम क्या उसकी पुस्तक दबा लेते हैं? नहीं ! हम महज़ उसे लौटना भूल जातें हैं । इस नैतिकता का मसीहा वह आदमी था जो अपने दोस्त को अपना पुस्तकालय दिखाने ले गया । हज़ारों बढियां पुस्तकें थी । मित्र देखकर दंग रह गया । बोला, 'बड़ा भारी स्टॉक है आपके पास पुस्तकों का ! पर ये ऐसी बेतरतीब पड़ी हैं । इन्हे आप आलमारियों में रखिये ।' जवाब मिला, " सो कैसे हो सकता है ? पुस्तकें तो मांगे से सब दे देते हैं, पर कोई अलमारी तो देता नहीं है ।" इस नैतिकता का पालन करनेवाले बड़े बड़े धर्मात्मा होतें हैं । गार्डनर ने ही कहा है कि एक श्रेष्ठ धर्मोपदेशक पादरी पाहिले दर्जे के डब्बे में मरे पाये गए । जब उनकी तलाशी ली गयी तो उनकी जेब में तीसरे दर्जे का टिकट निकला ।

अखबार मांगकर रोज़ पढ़ना और उसकी रद्दी बेच लेना कोई गलत काम नहीं है । यह प्रेम प्रकट करने का तरीका है । अब अगर कोई कहता है कि उसका पडोसी उससे प्यार करता है, तो मैं एकदम समझ जाता हूँ कि वह रोज़ इसका अखबार पढता होगा ।

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जखीरा, साहित्य संग्रह: कहावतों का चक्कर (व्यंग्य) - हरिशंकर परसाई
कहावतों का चक्कर (व्यंग्य) - हरिशंकर परसाई
कहावतों का चक्कर (व्यंग्य) - हरिशंकर परसाई जब मैं हाईस्कूल में पढता था, तब हमारे अंग्रेजी के शिक्षक को कहावतें और सुभाषित रटवाने की बड़ी धुन थी ।
जखीरा, साहित्य संग्रह
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