
संस्कृति के संवाहक
मूर्तियों में ढलने से पूर्वथैला भर प्लास्टर थे गणेश जी!
सरिए थे जूट के गट्ठल थे
भरे ड्रम के गंदले जल में निराकार पड़े थे!
कौन जानता था...
किस रंग आभा आकार में ढलेंगे
किनके हाथों बिकेंगे टैंपो में चढ़ेंगे
कौन ले जाएगा उन्हें अपने पूजा-पंडाल में
मंत्रोच्चार में कितनी बार पत्रित उच्चारित होंगे
कितनी रेज़गारी बटोरेंगे उनके पंडाल-आयोजक
कितने भोग चढ़ेंगे
कितने में नीलाम होंगे उनके हाथ के मोदक
सब कुछ धीरे-धीरे तय हुआ
आत्मकथा रची गई
प्लास्टर की थैली खुलते-खुलते
ढलते-सँवरते रचते चले गए
वे टाट से बने डेरे में
टाट के वे डेरे जबकि मूर्तिकारों के घर थे
आयोजकों के घर नहीं
पुरोहितों के नहीं
चंदे की नींव पर बने पंडाल जैसे भी नहीं
वे अँधेरे मिट्टी और गंदले-जल से निर्मित थे
वे कॉलोनियों के संभ्रांत इलाक़ों से परे थे
पटरों पर बने थे
देवमूर्तियों से अँटे थे
पर फिर भी पाताल में गड़े थे
डेरों की परवाह किसे थी
उनके लिए उत्सव के दिन कहाँ थे
उनके लिए समितियाँ कहाँ थीं
उनके लिए चंदे की रक़म कहाँ थी
उनके लिए भीड़ कहाँ थीं
उन पर हैलोजन लाइट कहाँ थी
वे रोशनी में नहाते कहाँ थे
वे आँखों की पुतलियों में कहाँ थे
उनकी उपमा तो ढेलों से होती थी
वे गलते थे बारिश में
धूप में खिंड जाते थे हवा-से
सभ्य जन की परिधि सिकुड़ती थी उन तक पहुँचते हुए
डेरों के लिए चैनल कहाँ थे
कैमरे के लेंस पंडाल की रोशनी के बाहर आते ही तड़क जाते थे
मूर्तिकार कहाँ थे मूर्तियों के निर्माण के बाद
गणेश जी ही गणेश जी थे
वे ही थे
जैसे संस्कृति के सच्चे संवाहक!
~ नरेश चंद्रकर