मीर तक़ी मीर के 25 बेहतरीन शेर
मीर तक़ी मीर साहब जिन्हें उर्दू शायरी में बहुत ऊँचा मुकाम हासिल है आपको खुदा-ए-सुखन (शायरी का खुदा) और उनकी शायरी की छाप आज के शायरों पर भी मिलती है |
इब्तिदा-ए-इश्क़ है रोता है क्या
आगे आगे देखिये होता है क्या
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है
आग थे इब्तिदा-ए-इश्क़ में हम
अब जो हैं ख़ाक इंतिहा है ये
देख तो दिल कि जाँ से उठता है
ये धुआँ सा कहाँ से उठता है
अब तो जाते हैं बुत-कदे से 'मीर'
फिर मिलेंगे अगर ख़ुदा लाया
नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है
याद उस की इतनी ख़ूब नहीं 'मीर' बाज़ आ
नादान फिर वो जी से भुलाया न जाएगा
इश्क़ इक 'मीर' भारी पत्थर है
कब ये तुझ ना-तवाँ से उठता है
क्या कहूँ तुम से मैं कि क्या है इश्क़
जान का रोग है बला है इश्क़
मीर' साहब तुम फ़रिश्ता हो तो हो
आदमी होना तो मुश्किल है मियाँ
होगा किसी दीवार के साए में पड़ा 'मीर'
क्या रब्त मोहब्बत से उस आराम-तलब को
मत सहल हमें जानो फिरता है फ़लक बरसों
तब ख़ाक के पर्दे से इंसान निकलते हैं
दिखाई दिए यूँ कि बे-ख़ुद किया
हमें आप से भी जुदा कर चले
दिल वो नगर नहीं कि फिर आबाद हो सके
पछताओगे सुनो हो ये बस्ती उजाड़ कर
सिरहाने 'मीर' के कोई न बोलो
अभी टुक रोते रोते सो गया है
मिरे सलीक़े से मेरी निभी मोहब्बत में
तमाम उम्र मैं नाकामियों से काम लिया
'मीर' हम मिल के बहुत ख़ुश हुए तुम से प्यारे
इस ख़राबे में मिरी जान तुम आबाद रहो
ले साँस भी आहिस्ता कि नाज़ुक है बहुत काम
आफ़ाक़ की इस कारगह-ए-शीशागरी का
चश्म हो तो आईना-ख़ाना है दहर
मुँह नज़र आता है दीवारों के बीच
आए अगर बहार तो अब हम को क्या सबा
हमसे तो आशियां भी गया और चमन गया
उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया
देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया
हम हुए, तुम हुए कि 'मीर' हुए
उस की ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए
बारे दुनिया में रहो ग़म-ज़दा या शाद रहो
ऐसा कुछ कर के चलो याँ कि बहुत याद रहो
कोई तुम सा भी काश तुम को मिले
मुद्दआ हम को इंतिक़ाम से है
तुम मिरे पास होते हो गोया
जब कोई दूसरा नहीं होता
आगे आगे देखिये होता है क्या
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है
आग थे इब्तिदा-ए-इश्क़ में हम
अब जो हैं ख़ाक इंतिहा है ये
देख तो दिल कि जाँ से उठता है
ये धुआँ सा कहाँ से उठता है
अब तो जाते हैं बुत-कदे से 'मीर'
फिर मिलेंगे अगर ख़ुदा लाया
नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है
याद उस की इतनी ख़ूब नहीं 'मीर' बाज़ आ
नादान फिर वो जी से भुलाया न जाएगा
इश्क़ इक 'मीर' भारी पत्थर है
कब ये तुझ ना-तवाँ से उठता है
क्या कहूँ तुम से मैं कि क्या है इश्क़
जान का रोग है बला है इश्क़
मीर' साहब तुम फ़रिश्ता हो तो हो
आदमी होना तो मुश्किल है मियाँ
होगा किसी दीवार के साए में पड़ा 'मीर'
क्या रब्त मोहब्बत से उस आराम-तलब को
मत सहल हमें जानो फिरता है फ़लक बरसों
तब ख़ाक के पर्दे से इंसान निकलते हैं
दिखाई दिए यूँ कि बे-ख़ुद किया
हमें आप से भी जुदा कर चले
दिल वो नगर नहीं कि फिर आबाद हो सके
पछताओगे सुनो हो ये बस्ती उजाड़ कर
सिरहाने 'मीर' के कोई न बोलो
अभी टुक रोते रोते सो गया है
मिरे सलीक़े से मेरी निभी मोहब्बत में
तमाम उम्र मैं नाकामियों से काम लिया
'मीर' हम मिल के बहुत ख़ुश हुए तुम से प्यारे
इस ख़राबे में मिरी जान तुम आबाद रहो
ले साँस भी आहिस्ता कि नाज़ुक है बहुत काम
आफ़ाक़ की इस कारगह-ए-शीशागरी का
चश्म हो तो आईना-ख़ाना है दहर
मुँह नज़र आता है दीवारों के बीच
आए अगर बहार तो अब हम को क्या सबा
हमसे तो आशियां भी गया और चमन गया
उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया
देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया
हम हुए, तुम हुए कि 'मीर' हुए
उस की ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए
बारे दुनिया में रहो ग़म-ज़दा या शाद रहो
ऐसा कुछ कर के चलो याँ कि बहुत याद रहो
कोई तुम सा भी काश तुम को मिले
मुद्दआ हम को इंतिक़ाम से है
तुम मिरे पास होते हो गोया
जब कोई दूसरा नहीं होता