रेणु का जीवन संघर्ष और उनके साहित्य की जन समस्याएं | जखीरा, साहित्य संग्रह

रेणु का जीवन संघर्ष और उनके साहित्य की जन समस्याएं

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फणीश्वर नाथ रेणु के जीवन और साहित्य पर डॉ. जियाउर रहमान जाफ़री का लेख आप सभी के लिए | हिंदी की नई कहानी एक प्रकार से निराशा कुंठा और ना...

फणीश्वर नाथ रेणु के जीवन और साहित्य पर डॉ. जियाउर रहमान जाफ़री का लेख
फणीश्वर नाथ रेणु के जीवन और साहित्य पर डॉ. जियाउर रहमान जाफ़री का लेख आप सभी के लिए |
हिंदी की नई कहानी एक प्रकार से निराशा कुंठा और ना उम्मीदी की कहानी है | देश की आजादी से जो उम्मीदें वाबस्ता थीं वह आजादी के कुछ समय बाद टूटने लगी थी | देश की आजादी एक राजनीतिक आजादी बनकर रह गई थी | समाज के दबे कुचले लोग अब भी हाशिए पर थे मोहभंग की इसी स्थिति ने हिंदी साहित्य में नई कहानी आंदोलन का सूत्रपात किया | नई कहानी आंदोलन भी मुख्यतः शहरी मध्यवर्ग के ही इर्द-गिर्द घूमती रही इसका एक कारण यह भी था कि नई कहानी आंदोलन से जुड़े हुए अधिकतर कहानीकार कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, मोहन राकेश, दुष्यंत कुमार, निर्मल वर्मा आदि ने अपना ठिकाना शहर में तलाश लिया था | इस प्रकार नई कहानी से भी ग्रामीण जीवन खारिज हो गई थी | समाज के वंचित और पिछड़े तबके को उस दौर में अगर किसी ने उठाया तो उनका नाम फणीश्वर नाथ रेणु था

रेणु की कहानियों में समाज के दबे कुचले और आर्थिक दृष्टि से विपन्न लोग रहते हैं | रेणु की विशेषता यह है कि रेणु गांव की संस्कृति, उसके रस्मो रिवाज, उसकी भाषा, उसकी संवेदना और लोकजीवन से वाकिफ़ हैं | उनकी कहानियों के पात्र अशिक्षित हैं, भोले भाले हैं, अपने अधिकार को नहीं जानते इसलिए लोगों के द्वारा ठगे जाते हैं |रेणु के साहित्य खासकर 'मैला आँचल' में गांव में बढ़ती दूरियां जाति प्रथा बीमारी और अनुचित कर्तव्य का जीता जागता दस्तावेज है | बाहर से सफेदपोश इसके अधिकतर पात्र मेले हैं, और सामाजिक कुकृत्य के शिकार हैं | 1954 में प्रकाशित रेणु का मैला आंचल हिंदी का प्रथम चर्चित आंचलिक उपन्यास है | इस उपन्यास का मेरी गंज गांव पूर्णिया का ही नहीं बल्कि भारत के तमाम गांव की राजनीतिक सामाजिक सांस्कृतिक और आर्थिक दुर्दशा का चित्रण करता है | यह एक सफल उपन्यास तो है ही यह रेणु की प्रसिद्धि का आधार भी है | यह अलग बात है कि इस पर अतिशय आंचलिकता दुरु भाषा शैली और अश्लीलत्व के दोष भी लगते रहे हैं | रेणु जिस मेरी गंज का वर्णन कर रहे हैं इसके आसपास लाखो एकड़ की जमीन है | इसमें दूब नहीं पनपती | मेरी गंज में राजपूत, यादव, और कायस्थ जैसे 12 वर्ण के लोग रहते हैं | जिसमें पुश्तैनी झगड़े और मनमुटाव हैं | सारे मेरी गंज में मुश्किल से दस लोग पढ़े हैं | इसलिए इसलिए अंधविश्वास और रूढ़ियां भी मौजूद हैं | मठ के महंत दुराचार और अनाचार में लिप्त हैं | मलेरिया सेंटर के इंचार्ज डॉ प्रशांत तक कमला से शारीरिक सुख प्राप्त कर लेते हैं |

रेणु की कहानियों में गांव के जीवन का जैसा चित्रण है उसे पढ़ते हुए लगता है रेणु ने अपनी कहानियों में पूरे गांव को समेट लिया है | उनकी कहानियां गांव के पिछड़ेपन को भी दूर करती हुई दिखाई देती है | रेणु ने यह दिखाया है कि गांव की उत्पादित वस्तुएं शहर में बिकने लगी है |

रेणु का मैला आंचल एक आंचलिक उपन्यास माना जाता है | ऐसा नहीं है कि आंचलिकता सिर्फ रेणु के उपन्यास में ही है | गांव के जनजीवन को लेकर शिवपूजन सहाय का देहाती दुनिया निराला का बिल्लेसुर बकरिहा इससे पहले आ चुका था | कालांतर में नागार्जुन का बलचनामा भी आंचलिक उपन्यास की श्रेणी में रखा गया है बिल्लेसुर बकरिहा में निराला ने गांव की विद्रूपताओं और विसंगतियों का वर्णन किया है तो बलचनामा में मालिक के शोषण का वर्णन है | 1953 में प्रकाशित भैरव गुप्त के गंगा मैया में किसान अपने अधिकार के लिए संगठित होते दिखते हैं | श्रीलाल शुक्ल का राग दरबारी इस बात का खुलासा करता है कि ग्राम पंचायतों के चुनाव में कितना भ्रष्टाचार होता है | ठीक इसी प्रकार गोविंद मिश्र का लाल पीली जमीन में भी बुंदेलखंड के गांव की पीड़ा का वर्णन है | रांगेय राघव के कब तक पुकारूं में भी गांव की इसी प्रथा का उद्घाटन हुआ है | रेणु के पहले या रेणु के बाद जो आंचलिक उपन्यास लिखे गए उसका फलक उतना व्यापक नहीं है जितना रेणु के आंचलिक उपन्यासों का है | रेणु के उपन्यास में राजनीतिक, सामाजिक, और धार्मिक भ्रष्टाचार का भी यथार्थ चित्रण है | रेणु का उपन्यास इसलिए भी सफल है कि उन्होंने स्वयं गांव में जिया है | रेणु के पहली कहानी बट बाबा थी और पहला कहानी संग्रह ठुमरी था, जो 1957में प्रकाशित हुई थी, पर रेणु की कहानियां और उपन्यास का जिक्र करते हुए हम यह भूल जाते हैं कि हिंदी में रिपोर्ताज की परंपरा को विकसित करने में भी उनका महत्वपूर्ण स्थान है | उनका रिपोर्ताज ऋणजल धनजल तो हिंदी रिपोर्ताज का सिरमौर ही है | गांव का आदमी बदहाली में जीवन गुजार रहा है | गांव में रोजगार का कोई साधन नहीं है | लोग भूखे मर रहे हैं | रेणु के उच्चारन नामक कहानी का रिक्शा चलाने वाला रामविलास जब कुछ कमा कर पटना से गांव आता है तो शहरी जीवन की उसकी कहानी सुनकर गांव के सब लोग पटना जाना चाहते हैं | गांव के लोग की संवेदना उनकी कहानी संवदिया में देखते ही बनती है | जहां हरगोविन कलपते हुए बड़ी बहुरिया का पेड़ पकड़ लेता है | भारत यायावर मानते हैं कि रेणु का मन ठीक संवदिया की तरह है, जो गांव की दुःख भरी गाथा को देख कर रोता बिलखता है |
1. रेणु की एक कहानी है 'पहलवान की ढोलक' संवेदना के स्तर पर यह एक सफल कहानी है | पहलवान ने मरने से पहले कर कह दिया था जब मैं मर जाऊं तो चिता पर मुझे पीठ के बल सुलाना | मैं जिंदगी में कभी चित नहीं हुआ और चिता सुलगाने के समय ढोलक बजा देना |
2. ऐसी ही रेणु की एक प्रसिद्ध कहानी संवदिया है | रेणु के अनुसार आदमी भगवान के घर से ही संवदिया बनकर आता है | कारण यह है कि बिना मजदूरी लिए वह गांव-गांव संवाद पहुंचाता है | मानवीय संवेदना से भरपूर उनकी एक ऐसी ही कहानी रसूल मिस्त्री है, जो सभी तरह के मशीनों के कल पुर्जे को ठीक कर देता है |

इस बदलते वक्त में सब कुछ बदल गया है | गांव में भी आधुनिकता आ गई है, लेकिन रसूल की दुकान अभी भी उसी हालत में पेड़ के नीचे है, क्योंकि रसूल अपने लिए नहीं दूसरे की समस्याओं का समाधान निकालते हुए जीता है | आज गांव में भी अपनापन नहीं रहा और रसूल मिस्त्री जैसे लोग दुर्लभ होते जा रहे हैं | रेणु अपने पात्र में सिरचन का जिक्र करते हैं, जो हमारे मन पर अमिट छाप छोड़ देता है | रेणु की कहानियों में गांव के जीवन का जैसा चित्रण है उसे पढ़ते हुए लगता है रेणु ने अपनी कहानियों में पूरे गांव को समेट लिया है | उनकी कहानियां गांव के पिछड़ेपन को भी दूर करती हुई दिखाई देती है | रेणु ने यह दिखाया है कि गांव की उत्पादित वस्तुएं शहर में बिकने लगी है | रेणु कृत बट बाबा ऐसी ही कहानी है | लोगों का विश्वास है कि हर संकट में बट बाबा हमारी रक्षा करेंगे | उनकी पंचलाइट कहानी पढ़ते हुए आज भी कई साल पुराना गांव मन में जीवंत हो उठता है | जहां बिजली नहीं थी और पेट्रोमैक्स किसी खास मौके पर ही जलाए जाते थे | 1946 में लिखी बीमारों की दुनिया का वीरेन लगता है स्वयं रेणु के रूप में मौजूद हैं, जो बीमारी ठीक होते थे और फिर बीमार पड़ जाते थे | 1976 में वह गंभीर रूप से बीमार पड़े | उनके किडनी काम नहीं करने लगी, और 14 अप्रैल 1977 को इस जिंदा लेखक ने हमसे विदा ले ली | रेणु ने अपनी भाषा और शिल्प के नूतन प्रयोग किए | भले ही ये मौजूदा आलोचकों को ज्यादा नहीं भाई | कहानी नई कहानी पुस्तक में नामवर सिंह ने उनका जिक्र तक नहीं किया था पर उनकी कहानियां संवेदना के स्तर पर साहित्य जगत में अपना स्थान बनाती चली गई | जब गांव कस्बे में नहीं बदला था तो गांव में नाच मनोरंजन का प्रधान साधन था | इसी नाच के बहाने लाल पान की बेगम गांव के कलह का वर्णन करते ही हैं यह भी दिखाते हैं कि नाच देखने बलरामपुर जाते हुए कैसे सभी एक साथ हो जाते हैं | सुरेन्द्र चौधरी ने लिखा है लाल पान की बेगम का साधारण कथ्य अपनी संवेदनशीलता में असाधारण हो उठा है |
3. आंचलिकता के शिल्पी रेणु की प्रसिद्ध कहानियों में से एक कहानी तीसरी कसम है, जहां तीन अलग-अलग स्थितियों में तीन क़समें खाई जाती हैं | व्यक्ति के तौर पर भी रेणु का जीवन संघर्ष से भरा रहा |

गरीबी और बीमारी से उन्हें अंत तक निजात नहीं मिल सकी गरीबों, दलितों के प्रति स्नेहिल रेणु सत्ताधीशों के प्रति बगावती बने रहे |

1974 के जेपी आंदोलन में रेणु ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था | 1975 के आपातकाल और बिहार छात्र आंदोलन के दौरान भी वह सक्रिय रहे | सफेदपोशों को बेनकाब करने वाले उनके दो उपन्यास रांड का बेटा सांड और कागज की नाव को प्रकाशित होने ही नहीं दिया गया | उनकी पैदाइश के साथ घर का जो क़र्ज़ था वह मृत्यु के बाद भी न चुकाया जा सका | जब रेणु पैदा हुए थे तो घर क़र्ज़ से दबा हुआ था, इसलिए ऋण में जन्म लेने के कारण उनका नाम रिनुआ रखा गया |आगे चलकर रेणु बन गए | बकौल अमित कुमार विश्वास रेणु पर वास्तव में धरती पर व्याप्त शोषण का ऋण था उसी ऋण को चुकाने के लिए उन्होंने लेखनी को अपनाया |
4. रेणु को भरोसा था एक दिन समाज बदलेगा और सर्वहारा वर्ग की जीत होगी | मैला आंचल में रेणु कहते हैं जिस तरह सूरज का डूबना एक महान सत्य है |उसी तरह पूंजीवाद का नाश होना भी उतना ही सच है |
5.रेणु बिहार विधानसभा के चुनाव में भी खड़े हुए थे, ताकि लोगों की बातें सरकार तक पहुंचाई जा सके लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा, मुनव्वर राना का एक शेर है |

शरीफ इंसान आखिर क्यों इलेक्शन हार जाता है
किताबों में तो लिखा है कि रावण हार जाता है

रेणु एक कवि भी थे | यह अलग बात है कि उनके उपन्यास और कहानी के आगे उनका कवि रूप दब सा गया है | उनकी कविताओं में भी उसी गांव, अंचल का वर्णन है जिसकी रेणु नुमाइंदगी करते हैं | उनकी एक कविता है 'मेरे मीत सनीचर' उसके कुछ पंक्तियां इस तरह है ....

बहुत दिनों के बाद गया था उन गांवों की ओर
खिल खिलकर हंसते क्षण अब भी जहां मधुर बचपन का
किंतु वहां भी देखा सब कुछ अब बदला बदला सा
इसलिए कुछ भारी ही मन लेकर लौट रहा था

लंबी सीटी देकर गाड़ी खुलने वाली थी
तभी किसी ने प्लेटफार्म से लंबी हांक लगाई

कहना न होगा कि हिंदी कथा साहित्य में रेणु प्रेमचंद के बाद सबसे महत्वपूर्ण लेखक हैं | इसलिए बेलारी गांव कहने के साथ जैसे प्रेमचंद का नाम जेहन में आता है | ठीक उसी तरह मेरीगंज की बात आते ही रेणु का मैला आंचल पर बरबस ध्यान चला जाता है | प्रेमचंद की लमही की तरह रेणु का गांव औराही हिंगना भी हिंदी जनमानस में अजर और अमर है |
- डा जियाउर रहमान जाफ़री
सन्दर्भ -
1. आजकल अप्रैल 2016,पृष्ठ 10
2. पाठ पुनर्पाठ -पृष्ठ 15-16
3. फणीश्वरनाथ रेणु, सुरेन्द्र चौधरी पृष्ठ 40
4. मैला आँचल, रेणु, पृष्ठ 84

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जखीरा, साहित्य संग्रह: रेणु का जीवन संघर्ष और उनके साहित्य की जन समस्याएं
रेणु का जीवन संघर्ष और उनके साहित्य की जन समस्याएं
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जखीरा, साहित्य संग्रह
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