हकीम मोमिन ख़ाँ 'मोमिन'- डा. रंजन ज़ैदी

हकीम मोमिन ख़ाँ 'मोमिन'- डा. रंजन ज़ैदी

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क हते है कि शायर जन्मजात शायर होता है. किन्तु उसकी शायरी उसके परिवेश और वातावरण से प्रभावित होती है, शायद कहीं तक सही भी हो | अरब के रेगि...

हकीम मोमिन ख़ाँ 'मोमिन'
हते है कि शायर जन्मजात शायर होता है. किन्तु उसकी शायरी उसके परिवेश और वातावरण से प्रभावित होती है, शायद कहीं तक सही भी हो |

अरब के रेगिस्तान की ओर नज़र डालें तो हम देखेंगे कि अरब का शायर इब्नुल-मोत्नर अगर राजशाही से न होता तो शायद यह शेर कभी न कह पाता-

फानाज-रुल्या कर्वर्क मिन फज़तः, क़दास्क़ल्तः हम्वाल्तः मिन अम्बर.(इब्ने-रूमी)
(यानी, चाँद को देखकर अम्बर के बोझ से दबी हुई चांदी की कश्ती की ओर ध्यान आकर्षित होना तभी संभव हो सकता है जब किसी ने इसे देखा हो |)

अरब के उस युग में जब वहां जेहालत का बोलबाला था और वहां के लोग प्राकृतिक दृश्यों के अतिरिक्त न तो कुछ देख-समझ सकते थे, और न ही कुछ इससे इतर सोच सकते थे, इब्नुल मोत्नर की ऐसी परिकल्पना उसके जन्मजात शायर होने की गवाही देती है | यहाँ एक बात यह भी महत्वपूर्ण है कि कुछ शायर ऐसे होते हैं जो अपनी मानसिक सोच और परिकल्पना से ऐसे वातावरण में पहुँच जाते हैं जो उसके इर्द-गिर्द के परिवेश में नहीं होता है | इसी लिये कहा जाता है कि शायरी वास्तविकता नहीं बल्कि वास्तविकता की अभिव्यक्ति होती है | वह कोई वैयक्तिक अनुभूति नहीं बल्कि अनुभूति का बयान है | यही कारण है कि शायरी की अभिव्यक्ति प़र की जाने वाली विभिन्न प्रकार की आलोचना मनुष्य की प्रकृति का एक हिस्सा है कहीं रूमी जन्म लेता है तो कहीं, कालीदास, कहीं होमर जन्म लेता है तो कहीं तुलसीदास, कहीं शेक्सपिअर तो कहीं ग़ालिब सूर्य का पिंड वही है उसके उदय और अस्त होने की प्रक्रिया आदिकाल से एक जैसी है | किन्तु यही सूर्य भिन्न स्थितियों को जन्म देता है | एक व्यक्ति के लिये यह प्रकाश-पुंज और जीवन का प्रतीक बन जाता है तो दूसरे के लिये वह भय व जीवन को नष्ट कर देने की शक्ति का स्रोत | इनमें कोई शायर भी नहीं है यह दो साधारण व्यक्तियों की मान्यताएं है एक प्रसन्न होकर गुनगुना उठता है, दूसरा उसके आगे नतमस्तक होकर उसे भगवान बना देता है | शायर भी ऐसे ही विरोधभासों से मुक्त नहीं है हालाँकि सभी के आकर्षण का केंद्र-बिंदु एक सूर्य ही होता है, किन्तु चिंतन, धारणाएं और आस्थाएं परस्पर भिन्नता लिये हुए होती हैं | रात के सन्नाटे में पपीहा किसी एक दिल को उम्मीद का सन्देशवाहक लगता है तो दूसरे को विरह का दूत | यही है वह भिन्नता जो व्यक्तियों को एक दूसरे से जुदा करती है | यही भिन्नता ग़ालिब और मोमिन में थी, जौक और इंशा में थी |

ज़माना था आखरी मुग़ल बादशाह बहादुरशाह ज़फर का | यह वह ज़माना था जब आखरी मुग़ल की ताजदारी की शमा भड़क रही थी हालाँकि अभी तक दिल्ली के दरवाजे प़र 1857 के ग़दर की धमक नहीं पहुंची थी | इसीलिए बादशाह के दरबार की महफ़िलों की रौनकें अपने आब-ओ-ताब के साथ बदस्तूर जलवाअफरोज थीं | शेरो-शायरी की महफ़िलों में ग़ालिब, जौक, मोमिन, ममनून, आज़ुर्दः, रख्शां, शेफ्तः, सहबाई, और अलवी जैसे शोअरा अपने कलाम की शम्में जलाये हुए थे, तभी एक ऐसा शायर दुनिया से कूच कर गया जिसने खुद्दारी को अपना तकिया बनाया था और जिसने दरबार-ए-शाही की कभी तारीफ नहीं की थी और न ही अंग्रेजों की आ रही आंधी से वह खौफज़दः था | यह शायर था हकीम मोमिन खां मोमिन | मोमिन 1315 हिजरी, यानी सन 1800 में दिल्ली स्थित कूचा-ए-चेलान मोहल्ले में पैदा हुए थे | मोमिन का खानदान बादशाह शाह आलम के शासनकाल में कश्मीर से दिल्ली आया था दादा हकीम नामदार खां अपने भाई हकीम कामदार खां के साथ दिल्ली में आकर शाही तबीबों (हकीमों) में शामिल हो गए | दोनों भाइयों की क़ाबलियत और हिकमत की सलाहियतों से खुश होकर बादशाह ने उन्हें परगना नारनोल के मौज़ा बिलहा में जागीर आता कर दी | कालांतर में जब ईस्ट इण्डिया कंपनी ने नवाब फैज़ तलब खां को झज्झर की रियासत सौंपी तो परगना नारनोल को इसी रियासत में शामिल कर लिया गया | नवाब ने हकीम नामदार के खानदान के साथ नाइंसाफी नहीं की बल्कि हज़ार रूपये की पेंशन बांध दी जो आगे जाकर हकीम मोमिन खां तक को मिलती रही | खुद ईस्ट इण्डिया कंपनी भी मोमिन के परिवार के 4 हकीमों को 100/- प्रति माह पेंशन देती थी | इसमें से एक चौथाई मोमिन के वालिद को मिलता था और बाद में कुछ मोमिन को भी मिलता रहा था | मोमिन का घरेलू नाम हबीबुल्लाह था | लेकिन हज़रत शाह अब्दुल अज़ीज़ कुद्सरह एक ऐसे सूफी बुज़ुर्ग थे जिनके हुजरे में मोमिन के वालिद हकीम गुलाम नबी खां भी हाजरी देते थे तो बेटे की विलादत प़र हज़रत शाह की दुआओं से उसे कैसे वंचित रखा जा सकता था | फकीर ने बच्चे के कान में अजान दी और नाम रखा मोमिन | घरवालों को बुरा लगा, प़र मोमिन “मोमिन खां” हो गए | कुछ का कहना है कि यह फकीर की ही दुआओं की बरकत थी कि मोमिन उर्दू-अदब में एक बुलंद शायर बनकर शोहरत की बुलंदियों तक जा पहुंचे......

मोमिन की बुनियादी तालीम मूलत: घर प़र ही हुई | औपचारिक रूप से उस्ताद शाह अब्दुल कादिर उनके पहले गुरू बने | मोमिन ने उनसे जो कुछ पढ़ा, वह उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गया | इल्म-ए-रोज़गार की ग़रज़ से अपने दोनों चचाओं यानी हकीम गुलाम हैदर खां और हकीम गुलाम हुसैन खां से इल्मे-तिब की तालीम ली और अपने खानदानी दवाखाने में बैठ गए लेकिन मन था कि उड़ा जाता था, कल्पनाओं में, अदब के असमानों में...मैंने इस नब्ज़ पे जो हाथ धरा, हाथ से मेरे मेरा दिल ही चला....और कुछ यूँ कि आफ़ते ताजः जो जाँ प़र आई, ये ग़ज़ल अपनी ज़बां प़र आई | यह शेर जिस ग़ज़ल का है, उर्दू अदब के नक्काद यानी आलोचकों का मानना है कि इस ग़ज़ल को लेकर उर्दू अदब मोमिन का अहसानमंद है यहाँ अगर हम आबे-हयात का ज़िक्र करे तो कतई गलत न होगा | आबे-हयात के अनुसार इसी ग़ज़ल को लेकर शेफ्तः ने फारसी में इतनी तारीफ लिखी थी कि कालांतर में विद्वानों को उसके उद्धरण तक देने ज़रूरी हो गए थे | शायद लोगों को यह जानकर हैरानी हो कि मोमिन बहुत अच्छे नुजूमी ( ज्योतिषी ) थे | इल्म-ए-नुजूम के एक भविष्यवक्ता के रूप में मोमिन शीघ्र ही महफ़िलों की रौनक बन गए | वह स्वभाव से हंसमुख, रंगीन, जिंदादिल, दोस्तपरस्त, पीने के शौक़ीन और जवान लड़कियों से घिरे रहने वाले नौजवान शायर थे | एक बार सामने एक ऐसा शख्स आया जो किसी मजनूँ की तरह दिखाई दे रहा था | मोमिन ने अपने इल्म से उसकी कुंडली बनायी और कहा कि नाहक वह मजनुओं की तरह भटक रहा है | इल्म कहता है कि जा मिल, तू कहता है कि वह है संग-दिल |

नहीं किया तुम ने अहकाम आजमाए, इन्हीं बातों ने तो ये दिन दिखाए
अगर वह अपने महबूब से जाकर मिले तो यह जुदाई के लम्हे ख़त्म हो जायेंगे |

ये सब कुछ सच प़र इतना भी कहेंगे,
कि जीते हैं तो एक दिन मिल रहेंगे

खुदा गवाह है कि मजनूँ की लैला भी मिलने के लिये उसी तरह तड़प रही है, जिस तरह मजनूँ इधर भटक रहा है यह बात सचमुच हैरत कर देने वाली थी, लेकिन थी बिलकुल सच | दोनों तरफ आग बराबर लगी हुई थी |

अभी से गर जफा कम हो तो अच्छा, ज़ियादः रब्त बाहम हो तो अच्छा
नहीं तो होगी उसकी शर्मसारी, किसे मंज़ूर है खिजलत तुम्हारी |

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि मोमिन ने इस बात में कोई दो राय नहीं है कि मोमिन ने जब फारसी में शायरी शुरू की तो ग़ालिब को कुछ झटका सा लगा | जिस तरह से मोमिन ने ग़ज़ल में फारसी की नाज़ुक तरकीबें इस्तेमाल करनी शुरू कीं, वे बेहद खूबसूरत थीं | यही नहीं बल्कि भावार्थ के एतबार से भी वे बहुमुखी थीं | ग़ालिब ने शायद फारसी से निकल कर उर्दू का दामन इस लिये पकड़ लिया कि मोमिन की शायरी ग़ालिब की परिकल्पना की बुलंदी तक नहीं पहुँच सकती थी | फारसी में भी ग़ालिब ने उर्फी और बेदिल से प्रेरणा ली थी किन्तु मोमिन को वह अपने रास्ते से आगे बढ़ते देखना नहीं चाहते थे | हालाँकि ग़ालिब के प्रशंसकों ने इस धारणा को स्वीकार नहीं किया क्योंकि बेदिल की शायरी इतनी बुलंद नहीं थी जितनी बुलंदी प़र ग़ालिब की शायरी पहुँच चुकी थी | तर्ज़े-बेदिल में रेख्ता लिखना, असदुल्लाह खां क़यामत है बात सही भी थी ग़ालिब को तो मोमिन से खौफ था | मोमिन की ईर्ष्या ने ही ग़ालिब को शायरी में इतने गहरे तक उतार दिया कि मोमिन ग़ालिब के सामने बहुत छोटे से लगने लगे,

धमकी में मर गया जो न बाबे-नबर्द था,
इश्क नबर्द पेशा तलबगार मर्द था |

ग़ालिब के देहावसान के ठीक 10 वर्षों बाद इकबाल का जन्म होता है। ग़ालिब का जन्म 1779 में हुआ था. उनके पास विरासत की शानदार दौलत, कालजयी साहित्य और साहित्यकारों में अमीर खुसरो से लेकर मीर तकी मीर की शायिरी और उनका चिंतन उपलब्ध था लेकिन जब दुनिया में इकबाल ने आँख खोली तो उन्होंने खुद को एक ऐसी पश्चिमी सांस्कृतिक और शैक्षिक संगठनों के प्रभा-मंडल में पाया जिससे ग़ालिब की सहमति उनकी आर्थिक मजबूरी से सम्बद्ध कही जा सकती है क्योंकि उन्हें खानदान-ए-मुगलिया से वसीका मिलता था लेकिन अपने पत्रों में वह अंग्रेजों की प्रशंसा करते थे। यही नहीं, वह दिल्ली कालेज में पालकी पर बैठकर नौकरी मांगने के लिए भी जा चुके थे। फोर्ट विलियम कालेज कलकत्ता में था, और उसके प्रभाव को भी ग़ालिब मान्यता दे चुके थे। अँगरेज़ अल्लामा इकबाल के भी प्रशंसक थे लेकिन वह उर्दू साहित्य के आधुनिक काल के ऐसे प्रथम प्रगतिशील शायर थे जिन्होंने पहली बार ब्रिटिश साम्राज्यवाद की आलोचना की थी। इस ओर लोगों का ध्यान बांगे-दराँ में पहली बार सर अब्दुल कादिर ने आकर्षित किया था। उर्दू शायरी में दार्शनिक चिंतन का इस्तेमाल सर्व-प्रथम ग़ालिब ने किया, वह आधुनिकतावाद की ओर बढने के इच्छुक नज़र आते हैं जैसा कि आईने-अकबरी पुस्तक पर की गई सर सय्यद की अपनी टिप्पणी से पता चलता है। इनसे पूर्व की शायरी में शास्त्रीय काव्य और काव्य में अध्यात्मवाद या आत्मवाद का प्रभाव परिलक्षित था।
- रंजन ज़ैदी /Dr Ranjan Jaidi
डा. रंजन ज़ैदी
परिचय
लेखक है डॉ. रंजन जैदी साहब । आपका जन्म बाड़ी, सीतापुर, उ. प्र. में हुआ । आपने हिन्दी (एम.ए.) और पी-एच.डी., अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ उ. प्र. से पूरी की जिसका शोध-विषय "हिन्दी उपन्यासकार राही मासूम रज़ा: कृतित्व एवं उपलब्धियां" था ।
आप कई लेखन विधाओ में पारंगत है जिनमे आपके कहानी, उपन्यास, आलोचना, रेडियो नाटक, रेडियो धारावाहिक और लेख शामिल है । आपने डाक्यूमेंट्री के लिया भी लिखा है । आपके लिखी रचनाओ के संग्रह विधा के अनुसार है :-
कहानी संग्रह: पर्त दर पर्त, रू-ब-रू, नसीरुद्दीन तख्ते खां, जड़ें तथा अन्य कहानियां, एक हथेली आधी दस्तक, रंजन जै़दी की कहानियां, खारे पानी की मछलियां
उपन्यास : और गिद्ध उड़ गया, बेगम साहिबा, हिंसा-अहिंसा, वासना के मुर्दाघर
आलोचना: अक्षर-अक्षर सत्य; हिन्दी साहित्य में मुस्लिम साहित्यकारों का योगदान ;संपादन आधी आबादी का सच, स्त्री-विमर्श -स्त्री-कथा, कथा-अनंता ;स्त्री-विमर्श, 201, वासना के मुर्दाघर (चलचित्रात्मक उपन्यास) 2015, इतिहास के झरोखे से; आलेख 2016, काव्य संकलन: नूर.
रेडियो नाटक : लगभग: 40 प्रसारित
रेडियो धारावाहिकः ये दाग़-दाग़ उजाला, नई दिल्ली.
डाक्युमेंटरी: सफ़र एक संकल्प का/25मि. ‘अब हमको आगे बढ़ना है, अपना इतिहास बदलना है, अब आगे बढ़ो...और बढ़ते चलो!
अन्य: 35एमएम फ़िल्म। ; महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, भारत सरकार; मूल हिन्दी गीत की गायिकाः श्रेया घोषाल। संगीतः आदेश श्रीवास्तव, गायकः 15 भाषाओं में, उषा उत्थुप तथा अन्य। और असंख्य लेख, साक्षात्कार, समीक्षाएं देश-विदेश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में।
आपको सारिका कहानी पुरस्कार (1985), साहित्य-कृति पुरस्कार (1985), दिल्ली हिन्दी अकादमी (1985-86), महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता पुरस्कार (1991) से सम्मानित किया गया ।
वर्तमान में आप मीडिया-सलाहकार के रूप में "नई जंग वेब" न्यूज़, एंटरटेनमेंट साईट नेटवर्क, ग़ज़िआबाद-201014 में कार्यरत है ।
आपसे संपर्क निम्न माध्यम से किया जा सकता है :-
Mob; +911204139981, ranjanzaidi786@yahoo.com

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ia,11,javed-akhtar,15,jawahar-choudhary,1,jazib-afaqi,2,jazib-qureshi,2,jigar-moradabadi,10,johar-rana,1,josh-malihabadi,7,julius-naheef-dehlvi,1,jung,7,k-k-mayank,2,kabir,1,kafeel-aazar-amrohvi,1,kaif-ahmed-siddiqui,1,kaif-bhopali,6,kaifi-azmi,10,kaifi-wajdaani,1,kaka-hathrasi,1,kalim-ajiz,1,kamala-das,1,kamlesh-bhatt-kamal,1,kamlesh-sanjida,1,kamleshwar,1,kanhaiya-lal-kapoor,1,kanval-dibaivi,1,kashif-indori,1,kausar-siddiqi,1,kavi-kulwant-singh,1,kavita,177,kavita-rawat,1,kedarnath-agrawal,4,kedarnath-singh,1,khalid-mahboob,1,khalil-dhantejvi,1,khat-letters,10,khawar-rizvi,2,khazanchand-waseem,1,khudeja-khan,1,khumar-barabankvi,4,khurram-tahir,1,khurshid-rizvi,1,khwaja-meer-dard,4,kishwar-naheed,2,krishankumar-chaman,1,krishn-bihari-noor,9,krishna,9,krishna-kumar-naaz,5,kuldeep-salil,1,kumar-pashi,1,kumar-vishwas,2,kunwar-bechain,9,kunwar-narayan,5,lala-madhav-ram-jauhar,2,lata-pant,1,lavkush-yadav-azal,3,leeladhar-mandloi,1,liaqat-jafri,1,lori,2,lovelesh-dutt,1,maa,23,madhavikutty,1,madhavrao-sapre,1,madhusudan-choube,1,mahadevi-verma,3,mahaveer-uttranchali,5,mahboob-khiza,1,mahendra-matiyani,1,mahesh-chandra-gupt-khalish,2,mahmood-zaki,1,mahwar-noori,1,maikash-amrohavi,1,mail-akhtar,1,maithilisharan-gupt,2,majdoor,12,majnoon-gorakhpuri,1,majrooh-sultanpuri,5,makhanlal-chaturvedi,2,makhdoom-moiuddin,7,makhmoor-saeedi,1,mangal-naseem,1,manglesh-dabral,4,manish-verma,3,mannan-qadeer-mannan,1,manoj-ehsas,1,manzoor-hashmi,2,manzoor-nadeem,1,maroof-alam,20,masooda-hayat,2,masoom-khizrabadi,1,matlabi,3,mazhar-imam,2,meena-kumari,14,meer-anees,1,meer-taqi-meer,10,meeraji,1,mehr-lal-soni-zia-fatehabadi,5,meraj-faizabadi,3,milan-saheb,2,mirza-ghalib,60,mirza-muhmmad-rafi-souda,1,mirza-salaamat-ali-dabeer,1,mithilesh-baria,1,miyan-dad-khan-sayyah,1,mohammad-ali-jauhar,1,mohammad-alvi,6,mohammad-deen-taseer,3,mohammad-khan-sajid,1,mohit-negi-muntazir,3,mohsin-bhopali,1,mohsin-kakorvi,1,mohsin-naqwi,2,moin-ahsan-jazbi,2,momin-khan-momin,4,motivational,2,mout,3,mrityunjay,1,mubarik-siddiqi,1,muhammad-asif-ali,1,muktak,1,mumtaz-hasan,3,mumtaz-rashid,1,munawwar-rana,26,munikesh-soni,2,munir-anwar,1,munir-niazi,3,munshi-premchand,10,murlidhar-shad,1,mushfiq-khwaza,1,mustafa-akbar,1,mustafa-zaidi,2,mustaq-ahmad-yusufi,1,muzaffar-hanfi,24,muzaffar-warsi,2,naat,1,naiyar-imam-siddiqui,1,naqaab,1,narayan-lal-parmar,3,naresh-chandrakar,1,naresh-saxena,4,naseem-ajmeri,1,naseem-azizi,1,naseem-nikhat,1,naseer-turabi,1,nasir-kazmi,8,naubahar-sabir,1,navin-c-chaturvedi,1,navin-mathur-pancholi,1,nazeer-akbarabadi,16,nazeer-baaqri,1,nazeer-banarasi,5,nazim-naqvi,1,nazm,177,nazm-subhash,2,neeraj-ahuja,1,neeraj-goswami,2,new-year,14,nida-fazli,30,nirankar-dev-sewak,1,nirmal-verma,3,nizam-fatehpuri,24,nomaan-shauque,4,nooh-aalam,2,nooh-naravi,1,noon-meem-rashid,2,noor-bijnauri,1,noor-indori,1,noor-mohd-noor,1,noor-muneeri,1,noshi-gilani,1,noushad-lakhnavi,1,nusrat-karlovi,1,obaidullah-aleem,3,om-prakash-yati,1,omprakash-yati,1,pandit-harichand-akhtar,4,parasnath-bulchandani,1,parveen-fana-saiyyad,1,parveen-shakir,12,parvez-muzaffar,5,parvez-waris,3,pash,7,patang,13,pawan-dixit,1,payaam-saeedi,1,perwaiz-shaharyar,2,phanishwarnath-renu,2,poonam-kausar,1,prabhudayal-shrivastava,1,pradeep-kumar-singh,1,pradeep-tiwari,1,prakhar-malviya-kanha,2,pratap-somvanshi,5,pratibha-nath,1,prem-lal-shifa-dehlvi,1,prem-sagar,1,purshottam-abbi-azar,2,pushyamitra-upadhyay,1,qaisar-ul-jafri,3,qamar-ejaz,2,qamar-jalalabadi,3,qamar-moradabadi,1,qateel-shifai,8,quli-qutub-shah,1,quotes,2,raaz-allahabadi,1,rabindranath-tagore,2,rachna-nirmal,3,rahat-indori,28,rahi-masoom-raza,6,rais-amrohvi,2,rajeev-kumar,1,rajendra-nath-rehbar,1,rajesh-joshi,1,rajesh-reddy,7,rajmangal,1,rakhi,4,ram,33,ram-meshram,1,ram-prakash-bekhud,1,rama-singh,1,ramapati-shukla,4,ramchandra-shukl,1,ramcharan-raag,2,ramdhari-singh-dinkar,5,ramesh-chandra-shah,1,ramesh-dev-singhmaar,1,ramesh-kaushik,1,ramesh-siddharth,1,ramesh-tailang,1,ramesh-thanvi,1,ramkrishna-muztar,1,ramkumar-krishak,1,ramnaresh-tripathi,1,ranjan-zaidi,2,ranjeet-bhattachary,1,rasaa-sarhadi,1,rashid-kaisrani,1,rauf-raza,4,ravinder-soni-ravi,1,rawan,3,rayees-figaar,1,raza-amrohvi,1,razique-ansari,13,rehman-musawwir,1,rekhta-pataulvi,7,review,11,rounak-rashid-khan,2,roushan-naginvi,1,rukhsana-siddiqui,2,saadat-hasan-manto,8,saadat-yaar-khan-rangeen,1,saaz-jabalpuri,1,saba-sikri,1,sabir-indoree,1,sachin-shashvat,2,sadanand-shahi,2,saeed-kais,2,safdar-hashmi,4,safir-balgarami,1,saghar-khayyami,1,saghar-nizami,2,sahir-hoshiyarpuri,1,sahir-ludhianvi,18,sajid-hashmi,1,sajjad-zaheer,1,salahuddin-ayyub,1,salam-machhli-shahri,2,salman-akhtar,4,samar-pradeep,6,sameena-raja,1,sanjay-dani-kansal,1,sanjay-grover,3,sansmaran,9,saqi-faruqi,3,sara-shagufta,5,saraswati-kumar-deepak,2,saraswati-saran-kaif,2,sardaar-anjum,2,sardar-aasif,1,sardi,1,sarfaraz-betiyavi,1,sarshar-siddiqui,1,sarveshwar-dayal-saxena,6,satire,15,satish-shukla-raqeeb,1,satlaj-rahat,3,satpal-khyal,1,seema-fareedi,1,seemab-akbarabadi,2,seemab-sultanpuri,1,shabeena-adee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जखीरा, साहित्य संग्रह | उर्दू हिन्दी साहित्य संग्रह: हकीम मोमिन ख़ाँ 'मोमिन'- डा. रंजन ज़ैदी
हकीम मोमिन ख़ाँ 'मोमिन'- डा. रंजन ज़ैदी
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