कहाँ की शाम और कैसी सहर, जब तुम नहीं होते
कहाँ की शाम और कैसी सहर, जब तुम नहीं होतेतडपता है ये दिल आठो पहर, जब तुम नहीं होते
कली, किरने, महक, गुल, माहो अंजुम, चांदनी, शबनम
सभी तो फेर लेते है नजर, जब तुम नहीं होते
मेरे एहसास कि रग़-रग़ में जम जाता है पारा-सा
नहीं रहती मुझे कुछ भी खबर, जब तुम नहीं होते
कलम, रूमाल, कागज, ख़त, किताबे, फुल, गुलदस्ते
पड़े रहते है यूँ ही मेज पर, जब तुम नहीं होते
शबे-तन्हाई कि तारीकियो में 'साज' कि आँखे
लुटा देती है अश्को के गुहर, जब तुम नहीं होते - साज़ जबलपुरी
मायने
सहर = सुबह, माहो-अंजुम = चाँद सितारे, शबनम = ओस, शबे-तन्हाई = वियोग रात्रि, तारीकिया = अँधेरे, अश्क़ = आसू, गुहर = गौहर/मोती
kahan ki sham aur kaisi shahar, jab tum nahi hote
kahan ki sham aur kaisi shahar, jab tum nahi hotetadpata hai ye dil aatho pahar, jab tum nahi hote
kali, kirne, mahak, gul, maho anjum, chandni, shabnam
sabhi to fer lete hai nazar, jab tum nahi hote
mere ehsas ki rag-rag me jam jata hai para-sa
nahi rahti mujhe koi bhi khabar, jab tum nahi hote
kalam, rumal, kagaj, khat kitabe, phool, guldaste
pade rahte hai yun hi mez par, jab tum nhi hote
shabe-tanhai ki tarikiyo me "Saaj" ki aankhe
luta deti hai ashko ke guhar, jab tum nahi hote - Saaz Jabalpuri