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मुहम्मद अली जौहर की पैदाइश 1878 में हुई थी । उनका ख़ानदान बिजनौर का था लेकिन ग़दर के बाद मुरादाबाद आ बसे थे। जब दो.साल के थे वालिद साहब का इंतकाल हो गया बचपन मे ही यतीमी के दर्द को बर्दाश्त करना पड़ा। 
बी अम्मा ने जिस हिम्मत और हौसले के साथ अपने बच्चे की परवरिश की वो अपने आप में एक मिसाल है उस दौर मे बी अम्मा ने अपने बच्चे को अंग्रेज़ी तालीम से आशना कराया।
मुहम्मद अली की पढ़ाई की शुरुआत घर से हुई घर पर अरबी फारसी पढ़ने के बाद, बरेली के हाई स्कूल मे दाख़िल कर दिये गये ... उस वक्त बरेली के हाई स्कूल में शौकत अली (बड़े भाई ) भी तालीम हासिल कर रहे थे, बरेली स्कूल में पढ़ने के बाद मुहम्मद अली जौहर का दाखिला अलीगढ़ मे शौकत अली की निगरानी में हो गया ...।
मुहम्मद अली ज़हीन थे लेकिन पढाई से दूर भागते थे, क्रिकेट के मैदान, सैर तफ़रीह में अक्सर मिल जाते, हाज़िर जवाब थे और झगड़ालू भी, तकरीर का शौक था, मुहम्मद अली जौहर ने 1896 में बी.ए. का एग्ज़ाम दिया और यूनिवर्सिटी में टॉप कर गये जो लोगों के लिए हैरानी की बात थी।
अलीगढ़ के बाद मुहम्मद अली इंग्लैंड चले गए, इंग्लैंड में ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के लिंकन कॉलेज में एडमिशन हुआ, लेकिन पढ़ने से हमेशा भागते थे इसलिए ICS में नाकामयाब हो गये, जब बड़े भाई शौकत अली को भाई की नाकामी की ख़बर पहुंची तो चेहरा पीला हो गया, बी अम्मा ने उनका हौसल बढ़ाया और मोहम्मद अली को वापस बुलाने के लिए कहा।
सिविल सर्विस के इम्तहान में नाकामी के बाद मोहम्मद अली वापस आ गये और रामपुर में इनकी शादी हो गयी, शौकत अली ने एक बार फिर हिम्मत करके इन्हें ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी भेजा जहाँ से मोहम्मद अली ने हिस्ट्री में ऑनर्स किया ...
वहां से वापस आकर कुछ दिन तक रामपुर हाई स्कूल में प्रिंसिपल के ओहदे पर क़ायम रहे, उनके खिलाफ़ साजिशों का दौर जारी रहा जिससे मोहम्मद अली ने खुद प्रिंसिपल का ओहदा छोड़ दिया ...
फिर रियासत बरौदड़ा में महकमा अफ़ीम में मुलाज़मत की लेकिन मोहम्मद अली मुलाज़मत करने के लिए पैदा नही हुए थे।
बहुत मेहनत और कोशिश के बाद मोहम्मद अली ने 1911 में कोलकाता से कामरेड नाम का अख़बार निकाला ... कामरेड लोगों के दिलो दिमाग पर छाता गया ... कामरेड के पढ़ने वालों में सबसे बड़ी तादाद अंग्रेज़ों की थी,
उसी वक़्त हिंदुस्तान की राजधानी को अंग्रेजों ने कोलकाता से दिल्ली शिफ़्ट कर दिया, मोहम्मद अली ने भी अपने अख़बार को दिल्ली शिफ़्ट कर दिया और दिल्ली में हमदर्द नाम से अख़बार निकाला ।
मोहमडन ओरिएण्टल कॉलेज को अलीगढ यूनिवर्सिटी में तब्दील करने के लिए मोहम्मद अली ने दिन रात एक कर दिया वहीँ जामिया मिलिय्या तो मोहम्मद अली की सोच ही थी, मोहम्मद अली जौहर मुस्लिम लीग के फाउंडर मेम्बर में से थे, और 1906 से ही लीग से जुड़े रहे लेकिन खिलाफ़त मूवमेंट को कांग्रेस ने सपोर्ट किया इस बुनियाद पर वो कांग्रेस में आ गये,
और असहयोग आन्दोलन में कांग्रेस की मदद की लेकिन गाँधी की खद्दर में जब हिन्दू महासभा के लोग घुसने लगे तो मौलना ने कांग्रेस का साथ छोड़ दिया और वापस अपना अख़बार हमदर्द निकालने लगे, मौलाना के कांग्रेस छोड़ने की सबसे बड़ी वजह मोती लाल नेहरु की नेहरु रिपोर्ट थी, मोतीलाल ने 1916 के लखनऊ पैक्ट को भुला दिया था।
मुहम्मद अली जौहर को 1921 में दो साल की सज़ा भी सुनाई गयी थी, इसके इलावा कई बार अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ़ लिखने पर नज़रबंद कर दिया गया, मोहम्मद अली जिन्ना कभी वकील बन कर जाते के अंग्रेज़ो को ये यक़ीन दिला दो के तुम आगे से हुकूमत के खिलाफ़ नहीं लिखोगे ? लेकिन मुहम्मद अली जौहर जहाँ जमे थे वहीं जमे रह जाते...
फ़लस्तीन के मुफ़्ती अमिन अल हुस्सैनी साहब कहते हैं के एक रात ख़ाना काबा के पास से गुज़र हुआ तो देखता हूँ एक आदमी सजदे में हैं और दुआ कर रहा है के अल्लाह मेरी किसी ख़्वाहिश को कबुल न करना सिर्फ एक बार खिलाफ़त राशदा का मंज़र दिखा दे और हिंदुस्तान को गैरों के पंजे से आज़ाद करा दे ...
अमीन अल हुस्सैनी कहते है जब वो आदमी सर उठाता है तो मै देखता हूँ ये मुहम्मद अली जौहर है।
फरवरी 1929 का दौर था, मुहम्मद अली जौहर कांग्रेस से दूर हो चुके थे, बीमार भी थे ... मुम्बई के अस्पताल मे एडमिट थे, डायबटिज अपने उरुज (हाई लेवल) पर था ... डॉ कटर ने बेड से उतरने को मना कर रखा था तभी बंबई मे फ़साद बरपा हो गया....
Mohd Ali Zouhar
मुहम्मद अली जौहर जिस अस्पताल मे थे वहाँ फ़साद के मारे पहुंचने लगे... किसी का हाथ टुटा, किसी का पैर झुलता हुआ ... अस्पताल मे हंगामा मचा हुआ था .... मौलाना ये सब देखकर बेड से उतरे ..... मुम्बई के कमाटी पुरा इलाके मे गये .... वहाँ के लोगों को समझाया और दंगे से दूर किया ... मौलाना अपनी बीमारी छोड़ बंबई की गलियों मे लोगों की जान बचाने, फ़सादी को समझाने के लिए फिर रहे थे....।
1930 में पहली राउंड टेबल मीटिंग हुई थी, जिसमे मुहम्मद अली जौहर हिस्सा लेने फ़लस्तीन गए और वहां साफ़ अंदाज़ में ये ऐलान कर दिया के मै मुल्क की आज़ादी का परवाना यहाँ से लेकर जाना चाहता हूँ, अगर ब्रिटश हुकूमत ये नही कर सकती तो मै एक ग़ुलाम मुल्क में मरना पसंद नही करूँगा ....ये इत्तेफ़ाक था या कुछ और मोहम्मद अली का उसी रात इन्तेकाल हो गया, मोहम्मद अली की आख़री आरामगाह फ़लस्तीन में है...- Kamran Ibrahimi
नोट : यह लेख हुमा शहनाज के फेसबुक वाल से लिया गया है | 
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