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साहिर लुधियानवी 1940 से आज तक ज़हनों को चौंकाये रखने वाले शायर का नाम है। उनकी शायरी लोक चेतना में रस घोलती है और दुनिया और जीवन के रहस्य का बोध कराती है। साहिर अपने दौर ही का नहीं, हर दौर का शायर है। साहिर ने जो लिखा वो परदे की ज़रुरत के तहत लिखा, लेकिन जो सोचा वो पीढ़ियों और ज़मानों तक काम में आने वाली बातें हैं। उनका हर एक गीत, ज़िन्दगी को अर्थपूर्ण तरीक़े से जीने का सन्देश देता है।

न मुँह छुपा के जियो और न सर झुका के जियो

ग़मों का दौर भी आये तो मुस्कुरा के जियो

साहिर ने फ़िल्मों के माध्यम से जो भजन लिखे हैं वो भक्ति से मुक्ति तक की राह को दर्शाने वाला एक अदभुत और सच्चा प्रयास है।  

अल्लाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम
सबको सन्मति दे भगवान

इतने महान और बहुआयामी व्यक्तित्व पर आज तक जितना लिखा जा चुका है वो उनकी साहित्यिक महानता के आगे न्यूनतर है। जो संदेश और फ़लसफ़ा, साहिर अपनी शायरी के माध्यम से छोड़ गए हैं वो नई पीढ़ी के लिए सीख भी है और ज़रुरत भी। उनका ये संदेश, नई पीढ़ी के लिए इक उदहारण का महत्त्व रखता है और उनका तत्व ज्ञान मानव जीवन को सच्चे रूप में जीने के लिए नए आयाम देता है ।

तोरा मन दर्पण कहलाये
भले बुरे सारे कर्मों को, देखे और दिखाये

आज ऐसा ही एक मौक़ा है, जब साहिर के इसी बुनियादी संदेश और जीवन के फ़लसफ़े से नई नस्ल को अवगत करवाने की आवश्यकता है। इसी आवश्यकता के अनुरूप समय-समय पर साहिर के जीवन और व्यक्तित्व पर बहुत सी किताबें और लेख छपते रहे हैं, जिनसे नई पीढ़ी को जीवन को समझने और मनोभाव के शुद्धिकरण के लिए मार्गदर्शन मिलता है। फ़िल्मों के माध्यम से ऐसा कारनामा बहुत कम गीतकारों ने किया है, जिनमें साहिर सर्वोच्च हैं। इन्होने गीतों के माध्यम से मानवीय चेतना के विकास का ऐसा अनुसन्धान किया है, जिसके संयुक्त परिणाम आज भी लाभदायक हैं।

तू हिन्दु बनेगा ना मुसलमान बनेगा
इन्सान की औलाद है इन्सान बनेगा

साहिर लुधियानवी का जन्म 8 मार्च, 1921 को लुधियाना में एक जागीरदार घराने में हुआ। इनका बचपन माँ-बाप के मन-मुटाव के बीच गुज़रा और आरंभिक शिक्षा, माँ-बाप के इन्हीं झगड़ों और अदालती कार्यवाहियों की भेंट चढ़ गई। ऐसी ही एक अदालती कार्यवाही के दौरान जब जज ने 11 साल के बच्चे (साहिर) से पुछा के तुम किस के साथ रहना चाहते हो, तो साहिर ने ख़ुद को एक तरफ शान-ओ-शौक़त और माल-ओ-दौलत से लदे बाप के करीब पाया, वहीँ दूसरी तरफ़ वक़्त और हालात से जूंझति, ज़िन्दगी की पेचीदगियों में फंसी माँ के आँचल में। ख़ैर साहिर ने माँ के साथ रहने का फैसला किया और एक लम्बे वक़्त तक ग़रीबी में रह कर ज़िन्दगी की कश्ती को दलदल से निकालने की कोशिश करता रहा।

साहिर का बचपन जहाँ ग़रीबी और मानसिक उलझनों में फंसा रहा वहां जवानी रोज़गार की तलाश में फ़िल्म इंडस्ट्री की चौखटों पर सर पटकने, दर-दर भटकने की नज़र होती नज़र आ रही थी। ऐसे में प्रेम धवन के कहने पर फिल्म "दोराहा" के लिए संगीतकार अनिल बिस्वास ने साहिर को एक ग़ज़ल लिखने का मौक़ा दिया, जो साहिर की आने वाली ज़िन्दग़ी में मील का पत्थर साबित हुई ।


मोहब्बत तर्क की मैंने गरेबाँ सी लिया मैं
ज़माने अब तो ख़ुश हो ज़हर ये भी पी लिया मैं ने

अभी ज़िंदा हूँ लेकिन सोचता रहता हूँ ख़ल्वत में
कि अब तक किस तमन्ना के सहारे जी लिया मैं ने

ऐसे ही महान संगीतकार सचिन देब बर्मन ने जब साहिर का हाथ थामा तो साहिर की तदबीर ने अपनी तक़दीर लिखना शुरू की और वो ज़िन्दगी के नए दाव खेलने के लिए तैयार हो गए -

तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले
अपने पे भरोसा है तो ये दाव लगा ले

थोड़ी ही मुद्दत के बाद बी आर चोपड़ा और यश चोपड़ा की सोहबत ने साहिर की संवरती किस्मत को और चमका दिया। ये चमक थी बी आर बैनर तले बनने वाली हर उस नायाब और अर्थपूर्ण फ़िल्म की जिसने साहिर की कलम को न सिर्फ़ लिखने की आज़ादी दी, बल्कि जानदार फ़िल्मी दृश्यों की बदौलत एक सुनेहरा मौक़ा भी दिया। अब साहिर के ज्ञान की रोशनी दीपावली के दीयों की तरह लोगों के ज़हनों को रोशन करने लगी।

कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है
कि ज़िंदगी तेरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छाओं में
गुज़रने पाती तो शादाब हो भी सकती थी
यह तिरागी जो मेरे ज़ीस्त का मुकद्दर है
तेरी नज़र की शुआँओं में खो भी सकती थी

साहिर के गीतों ने 4 दशकों तक धूम मचाये रखी, किसी फ़िल्म में साहिर के गीतों का होना, फ़िल्म की कामयाबी का सूत्र समझा जाने लगा। साहिर ने अपने ज़माने के दिग्गजों के साथ काम किया और नाम भी कमाया, इनमें एस डी बर्मन, गुरु दत्त, देव आनंद, बी आर चोपड़ा वग़ैरह शामिल हैं। साहिर ने न सिर्फ़ अपनी शायरी बल्कि व्यावहारिकता से भी इंसानी क़द्रों को ज़िन्दगी भर नीचे गिरने नहीं दिया, चाहे हालात कितने ही सख़्त क्यों न रहे हों।

साहिर की ज़िन्दगी सख़्त, मेहनत भरी, जिद्दो-जहद और कश्मकश की रही। वक़्त ने साहिर को अपनी निजी ज़िन्दगी बनाने और संवारने का कोई मौक़ा नहीं दिया। वो शायर जिस ने लोगों की वीरान ज़िंदगियों को नई मुस्कान दी, उसका अपना जीवन इन मुस्कुराहटों से दूर ही रहा । फ़िल्मी परदे पर इन्होने एक से एक कामयाब रूमानी गीत लिखा, हालांकि इनके वास्तविक जीवन में कोई रूमानियत अपने अंजाम को नहीं पहुँच सकी, फिर वो लता मंगेश्कर से मोहब्बत हो, अमृता प्रीतम से इश्क़ हो, सुधा मल्होत्रा से लगाव हो या ख़दीजा मसरूर (मशहूर कहानीकार) से उनकी सगाई हो।

छू लेने दो नाज़ुक होठों को
कुछ और नहीं है जाम हैं ये
क़ुदरत ने जो हमको बख़्शा है
वो सबसे हंसीं ईनाम है ये

साहिर की पूरी शायरी और ज़िन्दगी पांच मज़बूत स्तंभों 
(1) औरत की हिमायत, 
(2) राष्ट्रीय एकता और अखंडता, 
(3) सामाजिक समानता, 
(4) देशभक्ति और 
(5) रूमानियत पर टिकी हुई है।

औरत ने जनम दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाज़ार दिया
जब जी चाहा मसला, कुचला , जब जी चाहा दुत्कार दिया
काबे में रहो या काशी में , निस्बत तो उसी की ज़ात से है
तुम राम कहो के रहीम कहो, मतलब तो उसी की बात से है
ये मस्जिद है वो बुतखाना, चाहे ये मानो चाहे वो मानो
साथी हाथ बढ़ाना, साथी हाथ बढ़ाना ,
 एक अकेला थक जायेगा मिल कर बोझ उठाना
ये देश है वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानों का
इस देश का यारों क्या कहना , ये देश है दुनिया का गहना
जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा,
रोके ज़माना चाहे रोके खुदाई तुमको आना पड़ेगा

साहिर आखिरी दिनों तक अपनी माँ के साथ अकेला रहा और फिर एक दिन माँ की मौत के 4 साल बाद 25 अक्टूबर 1980 को इंसानियत का ये पयामबर, इस दुनिया से कूच कर गया।

जिस्म की मौत, कोई मौत नहीं होती है
जिस्म मिट जाने से, इंसान नहीं मर जाते

साहिर के जीवन और उनकी फ़िक्र ने जो जोत जलाई थी उसे रोशन रखने के लिए साहिर लुधियानवी जीनियस ग्लोबल रिसर्च कौंसिल का गठन किया गया है। जिसने साहिर की फ़िक्र, सन्देश और फ़लसफ़े पर गहरा शोध करने और नई पीढ़ी में इन बातों को आम करने के लिए एक किताब "मैं साहिर हूँ" लिखवाई है, जिसे चन्दर वर्मा और डॉ सलमान आबिद ने 7 साल के शोध के बाद हिंदी और उर्दू भाषाओँ में लिखा है। इन किताबों को साहिर के अर्ध शतक मित्र श्री अमरनाथ वर्मा (चेयरमैन, स्टार पब्लिकेशन्स, नई दिल्ली) ने बड़े चाव से प्रकाशित किया है । 

डॉ सलमान आबिद और चन्दर वर्मा
साहिर लुधियानवी जीनियस ग्लोबल रिसर्च कौंसिल
https://www.facebook.com/SahirLudhianviGeniusGlobalCouncil
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  1. बहुत खूब । ये किताब मैंने भी पढ़ी है । नायाब तोहफा है साहिर के चाहने वालों के लिए ।

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  2. bahut hi badhiya articale hai congrats

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