ईद के दिन
ईद के दिन ये कैसी हालत हैकुछ ख़ुशी है न कुछ नज़ाकत है
जो हैं सारे उदास बैठे हैं
हाँ वही आसपास बैठे हैं
भीड़ है ईदगाह में लेकिन
कितना ग़म है निगाह में लेकिन
माँ है बैठी पुराने कपड़ों में
उसका बेटा है खाड़ी देशों में
दिल धड़कता है रात भर उसका
आज आना था, था सफ़र उसका
घर से सलमा की रुख़सती कल थी
ईद के बाद इक ख़ुशी कल थी
एक मनहूस फिर ख़बर आई
गुमशुदा आँख फिर से भर आई
जंग में शख्स वो तो मारा गया
घर में इक लाश को उतारा गया
कितनी माओं के गोद सूने हुए
एक ज़िद थी और कितने ख़तरे हुए
अब बुलाएं भी उनको नाहक क्या
ईद को हम कहें मुबारक क्या
~ डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफ़री
माफ़ी, अस्थावां, नालंदा 9934847941