
उड़ते-उड़ते एक दिन
उड़ते-उड़ते एक दिन,जा बैठूं किसी मुंडेर पर...
खिलखिलाती हो हंसी जहाँ,
हों खुशियां छोटी-छोटी।
प्यार करें इक-दूजे से सब,
मिलजुल कर खाएं रोटी।
उड़ते-उड़ते एक दिन,
जा बैठूं किसी मुंडेर पर...
न हो शोर-शराबा जहाँ,
बस सुने मधुर संगीत।
एक-दूसरे संग मिलकर,
करें सब समय व्यतीत।
उड़ने का हो समय,
मन करे बैठूं वहीं कुछ देर, पर।
अगले दिन फिर यूं ही,
जा बैठूं उसी मुंडेर पर।
उड़ते-उड़ते एक दिन... - मनीष वर्मा
परिचयमनीष वर्मा मूलतः दिल्ली के रहने वाले हैं और पिछले 12 सालों से हैदराबाद में रहते है। ये एक बहु-राष्ट्रीय संगठन में पिछले 12 सालों से कार्यरत है। इन्होने दिल्ली विश्विद्यालय से विज्ञान में शिक्षा प्राप्त की है और आजकल शौकिया तौर पर थोड़ा बहुत पठन एवम कविता लेखन करते हैं। इनकी रूचि में संगीत सुनना और छोटी छोटी कविताएँ लिखना शामिल है।
udte udte ek din
udte udte ek dinja baithu kisi munder par...
khilkhilati ho hansi jahaN,
ho khushiyaN chhoti-chhoti
pyar kare ek-duje se sab,
miljul kar khaye roti.
udte-udte ek din
ja baithu kisi munder par...
n ho shor-sharaba jahaN,
bas sune madhur sangeet.
ek-dusre sang milkar,
kare sab samay vytit.
udne ka ho samay,
man kare baithu wahi kuch der, par
agle din phir yun hi,
ja baithu usi munder par
udte-udte ek din...-Manish Verma
Bahut khoob👌