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हवा का रुख बदलने से
बहुत उछले, बहुत कूदे
वे जिनके शामियाने डोल चुके थे
उन्होंने ऐलान कर दिया
अब वृक्ष शांत हो गए है
अब तूफान का दम टूट गया है -

जैसे की जानते ही न हो
ऐलानो का तुफानो पर
कोई असर नहीं होता
जैसे की जानते ही न हो
वह उमस बहुत गहरी थी
जहा से तूफान ने जन्म लिया
जैसे की जानते ही न हो
तूफानों की वजह
वृक्ष ही नहीं होते
वरन वह घुटन होती है
धरती का मुखड़ा जो
धूल में मिलाती है
ओ भ्रमपुत्रों, सुनो
हवा ने दिशा बदली है
हवा बंद हो नहीं सकती
जब तक कि धरती का मुखड़ा
टहक गुलजार नहीं बनता
तुम्हारे शामियाने आज गिरे
कल गिरे
तूफान कभी भी मात नहीं खाते | - पाश (अवतार सिंह संधू )

अवतार सिंह संधू जिन्हें हम पाश नाम से जानते है | 9 सितम्बर 1950 को आपका जन्म हुआ था | उनके भीतर के कवि का जन्म 1965 को हुआ |  आपकी पहली कविता 1967 में छपी | प्रथम काव्य संग्रह "लोह पथ" 1970 में उनके जेल में रहने के दौरान प्रकाशित हुआ |
उसके बाद कुछ और संग्रह आये जिनमे "उदद्दे बजां मगर" (1974), "साडे सामियाँ विच" (1978), "लड़ेंगे साथी" (1988 -मृत्यूपरांत) आप जीवन भर राजनीति में सक्रीय रहे और जन संघर्षो में रहकर और लिखकर अपना योगदान देते रहे | जनता के हक़ में लड़ने के कारण उन्हें जनता का कवि कहा जाता है |
खालिस्तानी विचारधारा के स्पष्ट विरोधी होने के कारण आतंकवादियों ने 23 मार्च 1988 को उनकी हत्या कर दी |

Roman

hawa ka rukh badlane se
bahut uchchle, bahut kude
we jinke shamiyane dol chuke the
unhone ailan kar diya
ab vriksh shant ho gaye hai
ab tufan ka dam tut gaya hai -

jaise ki jante hu na ho
ailano ka tufano par
koi asar nahi hota
jaise ki jante hu na ho
wah umas bahut gahri thi
jahaan se tufan ne janm liya
jaise ki jante hu na ho
tufano ki wajah
vriksh hi nahi hote
waran wah ghutan hoti hai
dharati ka mukhda jo
dhul me milati hai
o bhrampurtro, suno
hawa ne disha badli hai
hawa band ho nahi sakti
jab tak ki dharati ka mukhda
tahak gulzar nahi banta
tumhare shamiyane aaj gire
kal gire
tufaan kabhi bhi maat nahi khate - Paash/Pash ( Avtar Singh Sandhu)
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