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तू हर परिंदे को छत पर उतार लेता है - मुनव्वर राना
तू हर परिंदे को छत पर उतार लेता है - मुनव्वर राना

तू हर परिंदे को छत पर उतार लेता है ये शौक़ वो है जो ज़ेवर उतार लेता है मै आसमां की बुलन्दी पे बारहा पहुचां मगर नसीब ज़मीं पर उतार लेता है...

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जुबां की, जात की, न मज़हब की बात करिये - अरमान खान
जुबां की, जात की, न मज़हब की बात करिये - अरमान खान

जुबां की, जात की, न मज़हब की बात करिये, जो करनी है सियासत, तो सब की बात करिये... तुम पढ़े लिखे हो मियाँ, तुम्ही जानों सो खुदा, हम अनपढ...

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होने लगी है जिस्म में जुंबिश तो देखिये - दुष्यंत कुमार
होने लगी है जिस्म में जुंबिश तो देखिये - दुष्यंत कुमार

होने लगी है जिस्म में जुंबिश तो देखिये इस पर कटे परिंदे की कोशिश तो देखिये गूँगे निकल पड़े हैं, ज़ुबाँ की तलाश में सरकार के ख़िलाफ़ ...

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वो चली गई - अशोक बाबु माहौर
वो चली गई - अशोक बाबु माहौर

वो यूँ ही एक मुस्कान छोड़ चली गई हाथ हथेली पर रख किधर गई, मैं ठगा सा देखता रहा तन्हा वो यादें बेबुनियाद दे गई | मैं ...

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उंगलियां उठेगी दुनिया में तेरी औलाद पर - जोश मलीहाबादी
उंगलियां उठेगी दुनिया में तेरी औलाद पर - जोश मलीहाबादी

उंगलियां उठेगी दुनिया में तेरी औलाद पर गलगला होगा वो आते है रज़ालत के पिसर तेरी मस्तुरात का बाजार में होगा क़याम मारिज़े-दुशनाम में तेरा ल...

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चंदा मामू (चंदा मामा )- खज़ानचंद वसीम
चंदा मामू (चंदा मामा )- खज़ानचंद वसीम

प्यारे चाँद चमकने वाले, दुनिया भर को तकने वाले सब के सर पर तेरा डेरा, सब से ऊँचा घर है तेरा तू जब अपनी खास शान से, नीले-नीले आसमान से द...

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पिछली प्रीत - जाँ निसार अख्तर
पिछली प्रीत - जाँ निसार अख्तर

हवा जब मुंह अँधेरे प्रीत की बंसी बजाती है कोई राधा किसी पनघट के ऊपर गुनगुनाती है मुझे इक बार फिर अपनी मोहब्बत याद आती है उफ़क पर आसमान ...

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सांप (लघुकथा ) - डॉ. जिया उर रहमान जाफरी
सांप (लघुकथा ) - डॉ. जिया उर रहमान जाफरी

उसे शरारत सुझी| उसने अपने मित्र के बिस्तर पर एक बनावटी सांप रख दिया...... मित्र ने जैसे देखा सांप -सांप चिल्लाने लगा.... उसे ये देखकर हं...

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जब भी दुश्मन बढ़ा ठिकानों तक - जिया उर रहमान ज़ाफरी
जब भी दुश्मन बढ़ा ठिकानों तक - जिया उर रहमान ज़ाफरी

जब भी दुश्मन बढ़ा ठिकानों तक हम न महदूद थे मकानों तक जिसने अपने परों को फैलाया वो परिंदा है आसमानों तक उम्र तोहमत लगाते गुज़री है ये स...

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मै समझता था कि अब रो न सकूंगा ऐ जोश - जोश मलीहाबादी
मै समझता था कि अब रो न सकूंगा ऐ जोश - जोश मलीहाबादी

जोश मलीहाबादी साहब के जन्मदिवस पर उनकी यहाँ ग़ज़ल पेश है आशा है आप सभी को पसंद आएगी मै समझता था कि अब रो न सकूंगा ऐ जोश | दौलते-सब्...

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कटवा रहे है आजकल वो उस जुबान को - सुरेन्द्र चतुर्वेदी
कटवा रहे है आजकल वो उस जुबान को - सुरेन्द्र चतुर्वेदी

कटवा रहे है आजकल वो उस जुबान को कहने जो लग गयी है अपनी दास्तान को है दूर काफी इस शहर में मन के मोहल्ले फिर भी सुरंगे जोड़ती है हर मका...

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