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Munwwar Rana Shayari

बाल दिवस पर आप सभी को शुभकामनाए और बच्चो को प्यार .. मुनव्वर साहब वैसे भी रिश्तों को बखूबी अपनी ग़ज़ल में समेट लेते है और खासकर माँ को ..
उनकी कई गज़ले बच्चो और माँ के रिश्ते पर कही हुई है इसी तरह कि एक ग़ज़ल पेश है

मैं इसके नाज़ उठाता हूँ सो यह ऐसा नहीं करती
यह मिट्टी मेरे हाथों को कभी मैला नहीं करती

खिलौनों की दुकानों की तरफ़ से आप क्यों गुज़रे
ये बच्चे की तमन्ना है यह समझौता नहीं करती

शहीदों की ज़मीं है जिसको हिन्दुस्तान कहते हैं
ये बंजर हो के भी बुज़दिल कभी पैदा नहीं करती

मोहब्बत क्या है दिल के सामने मजबूर हो जाना
जुलेखा वरना यूसुफ का कभी सौदा नहीं करती

गुनहगारों की सफ़ में रख दिया मुझको ज़रूरत ने
मैं नामरहम हूँ लेकिन मुझसे ये परदा नहीं करती

अजब दुनिया है तितली के परों को नोच लेती है
अजब तितली है पर नुचने पे भी रोया नहीं करती - मुनव्वर राना

मायने
नारहम – अपवित्र

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Roman

Maise iske naaz uthata hun so yah aisa nahi karti
yah mitti mere hatho ko kabhi maila nahi karti

khilone ki dukano ki taraf se aap kyo gujre
ye bachche ke tamnna hai yah samjhota nahi karti

shahido ki zameen hai jisko hindustaan kahte hai
ye banzar ho ke bhi buzdil paida nahi karti

mohbbat kya hai dil k samne majboor ho jana
julekha warna yusuf ka kabhi sauda nahi karti

gunahgaro ki saf me rakh diya mujhk jarurat ne
mai namharam hu lekin mujhse ye parda nahi karti

ajab duniya hai titli ke paro ko noch leti hai
azab titli hai par nuchne pe bhi roya nahi karti - Munwwar Rana

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