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"मेरे रश्क-ऐ-कमर तेरी पहली नज़र" यह गीत या असल में यूँ कहे ग़ज़ल आपने जरुर सुनी होगी और कानो में इसकी धून आते ही गुनगुनाई भी होगी | शायद आपको पता हो या न हो पर आपको हम बता दे यह ग़ज़ल मशहूर पाकिस्तानी शायर फ़ना बुलंद शहरी ने लिखी हुई है | जिसे जनता के सामने पहली बार उस्ताद नुसरत फ़तेह अली खां ने 1988 में पेश की थी |

फ़ना बुलंद शहरी का असल नाम मुहम्मद हनीफ था और फ़ना बुलंद शहरी आपका तखल्लुस | आप मशहूर शायर कमर जलालवी के शिष्य है |

इस ग़ज़ल में शायर ने अपना तखल्लुस भी लिखा है जो की हर शायर लिखता है पर यहाँ तखल्लुस फ़ना का उपयोग किया है जिसका दूसरा अर्थ मृत्यु भी होता है
ऐ फ़ना शुकर है आज बाद-ऐ-फ़ना
उसने रख ली मेरे प्यार की आबरू


मतलब मेरे प्रियतम ने मेरी मृत्यु के बाद भी मेरी मोहब्बत को वो इज्जत दी है उसके लिए मै शुक्रगुजार हू |

लीजिए आपके लिए पूरी ग़ज़ल पेश है :-

मेरे रश्क-ए-क़मर तुने पहली नज़र, जब नज़र से मिलाई मज़ा आ गया
बर्क सी गिर गयी काम ही कर गयी, आग ऐसी लगाईं मज़ा आ गया

जाम में घुल कर हुस्न की मस्तियाँ, चांदनी मुस्कुराई मज़ा आ गया
चाँद के साये में ऐ मेरे साक़िया, तू ने ऐसी पिलाई मज़ा आ गया

नशा शीशे में अंगड़ाई लेने लगा, बज़्म-ए-रिंदा में सागर खनकने लगा
मैकदे पे बरसने लगी मस्तियाँ, जब घटा गिर के छाई मज़ा आ गया

बे-हिज़ाबाना वो सामने आ गए, और जवानी जवानी से टकरा गयी
आँख उनकी लड़ी यूं मेरी आँख से, देख कर ये लड़ाई मज़ा आ गया

आँख में थी हया हर मुलाक़ात पर, सुर्ख आरिज़ हुए वस्ल की बात पर
उसने शर्मा के मेरे सवालात पे, ऐसी गर्दन झुकाई मज़ा आ गया

शैख़ साहिब का ईमान बिक ही गया, देख कर हुस्न-ऐ-साकी पिघल ही गया
आज से पहले ये कितने मगरूर थे, लुट गयी पारसाई मज़ा आ गया

ऐ "फ़ना" शुक्र है आज बाद-ए-फ़ना, उसने रख ली मेरे प्यार की आबरू
अपने हाथो से उसने मेरी कब्र पर, चादर-ऐ-गुल चढाई मज़ा आ गया - फ़ना बुलंद शहरी

मायने
रश्क = जलन, कमर = चाँद, बर्क = बिजली, साक़िया = शराब पिलाने वाला/वाली, बे-हिज़ाबाना=बिना नकाब के/ बिना परदे के, हया = शर्म, आरिज़ = गाल, वस्ल = मिलन, हुस्न-ऐ-साकी= शराब पिलाने वाली का सौंदर्य, मगरूर = घमंडी, पारसाई = छूकर सोना बना देने का वरदान, चादर-ऐ-गुल= फूलो की चादर

इस ग़ज़ल को नुसरत फ़तेह अली खां साहब की आवाज में सुनते है:-


Roman

Mere Rashk E Qamar Tu Ne Pehli Nazar, Jab Nazar Se Milaayi Maza Aagaya
Barq Si Gir Gayi Kaam Hee Kar Gayi, Aag Aisee Lagaayi Maza Aagaya

Jaam Mein Ghul Kar Husn kee Mastiyaan, Chaandni Muskurai Maza Aagaya
Chaand Ke Sa'ay Mein Ay Mere Saaqiya, Tu Ne Aisee Pilaayi Maza Aagaya

Nasha Sheeshe Mein Angrai Laine Laga, Bazm E Rindaan Mein Saagar Khanakne Laga
Maikade Pe Barasne Lagi Mastiyaan, Jab Ghata Gir Ke Chaayi Maza Aagaya

Be Hijabaana Wo Saamne Aagaye, Aur Jawaani Jawaani Se Takra Gayi
Aankh Unki Laree Yoon Meri Aankh Se, Daikh Kar Ye Laraai Maza Aagaya

Aankh Mein Thee Hayaa Her Mulaqaat Par, Surkh Aariz Hu'ay Wasl Ki Baat Par
Us Ne Sharma Ke Mere Sawaalat Pe, Aise Gardan Jhukaayi Maza Aagaya

Shaikh Sahib Ka Imaan Bik He Gaya, Daikh Kar Husn E Saqi Pigal He Gaya
Aaj Se Pehle Ye Kitne Maghroor The, Lut Gayi Parsaayi Maza Aagaya

Ay Fana Shukr Hai Aaj Baad E Fana, Us Ne Rakh Le Mere Pyaar Kee Aabro
Apne Haathon Se Usne Meri Qabr Par, Chaadar E Gul Charhaayi Maza Aagaya - Fana Buland Shehri

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  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, जाने भी दो यारो ... “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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    1. आपका बहुत-बहुत धन्यवाद और आभार |

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