0
आज आप सभी के निदा फाजली की लिखी रचना वालिद पर फातिहा पेश है 

तुम्हारी कब्र पर
मैं फातिहा पढ़ने नहीं आया

मुझे मालूम था
तुम मर नहीं सकते
तुम्हारी मौत की सच्ची ख़बर जिसने उड़ाई थी
वो झूठा था

वो तुम कब थे
कोई सूखा हुआ पत्ता हवा से हिल के टूटा था
मेरी आँखें
तुम्हारे मंजरों में कैद हैं अब तक
मैं जो भी देखता हूँ
सोचता हूँ
वो - वही है
जो तुम्हारी नेकनामी और बदनामी की दुनिया थी
कहीं कुछ भी नहीं बदला

तुम्हारे हाथ
मेरी उँगलियों में साँस लेते हैं
मैं लिखने के लिए
जब भी कलम काग़ज़ उठाता हूँ
तुम्हें बैठा हुआ अपनी ही कुर्सी में पाता हूँ
बदन में मेरे जितना भी लहू है


वो तुम्हारी
लग्ज़िशो नाकामियों के साथ बहता है
मेरी आवाज़ में छुप कर
तुम्हारा ज़हन रहता है
मेरी बीमारियों में तुम
मेरी लाचारियों में तुम
तुम्हारी कब्र पर जिसने तुम्हारा नाम लिक्खा है
वो झूठा है

तुम्हारी कब्र में मैं दफ्न हूँ
तुम मुझ में ज़िन्दा हो
कभी फ़ुर्सत मिले तो फातिहा पढ़ने चले आना - निदा फाज़ली

Roman

tumhari kabra par
mai fatiha padhne nahi aaya

mujhe maloom tha
tum mar nahi sakte
tumhari mout ki sachchi khabar jisne udai thi
wo jhutha tha

wo tum kab the
koi sukha hua patta hawa se hil ke tuta tha
meri aankhe
tumhare manzro me kaid hai ab tak
mai jo bhi dekhta hu
sochta hu
wo wahi hai
jo tumahri neknami aur badnami ki duniya thi
kahi kuch bhi nahi badla

tumhare hath
meri ungliyo me sans lete hai
mai likhne ke liye
jab bhi kalam kagaj uthatat hun
tumhe baitha hua apni hi kursi me pata hu
badan me mere jitna bhi lahu hai

wo tumhari
lagzisho nakamiyo ke sath bahta hai
meri aawaj me chup kar
tumhara zahan rahta hai
meri bimariyo me tum
meri lachariyo me tum
tumhari kabr par jisne tumhara naam likha hai
wo jhutha hai

tumhari kabra me mai dafn hun
tum mujh me zinda ho
kabhi fursat mul to fatiha padhne chale aana - Nida Fazli
#jakhira

Post a Comment Blogger

 
Top