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पकिस्तान के मशहूर शायर ज़मीर जाफरी साहब आज ही के इस दुनिया को अलविदा कह गए थे आज उनकी एक मशहूर ग़ज़ल पेश है :-

मेरी बीवी क़ब्र में लेटी है जिस हंगाम से
वो भी है आराम से और मैं भी हूँ आराम से

Syed Zameer Jafri
किस तरह गुज़रान होगी अब सुपर अक़्वाम से
माँगती हैं दाम भी वो बंदा-ए-बे-दाम से

घोड़े निकले ऊँट निकले मोटरें निकलीं मगर
एक भी आलिम न निकला आलम-ए-इस्लाम से

फिर वो जनरल इलेक्शन में भी होगा कामयाब
वो जो है मारूफ़ गुल-घोटू के उर्फ़-ए-आम से

जैसे सच कुछ भी नहीं जैसे ख़ुदा कोई नहीं
किस क़दर उम्मीदें वाबस्ता हैं अंकल-साम से

जाने क्या पैवंद-ए-आदम से ये अब पैदा करें
आम और अमरूद पैदा कर लिया बादाम से

दीन तो बचता नज़र आता नहीं न्यूयॉर्क में
ज़ुल्फ़ ही अपनी बचा ले जाइए हज्जाम से

शेर का हिस्सा अगर अल्फ़ाज़ पर रक्खा गया
खेलना है जाम से और वो भी ख़ाली जाम से

एक ही पैग़ाम है मेरा जवानान-ए-अज़ीज़
नाम पाओ इल्म से आराम पाओ काम से

हुस्न नेचर की अता अज़्मत समर तहज़ीब का
मुनफ़रिद है मिस्र अपने नील और अहराम से

गर सियासत में रहीं ऐसी ही ख़र-बाज़ारियाँ
पार्लियामेन्टें ख़रीदी जाएँगी नीलाम से -सय्यद ज़मीर जाफ़री

मायने
हंगाम = समय से, अक़्वाम= राष्ट्र / देश, बंदा-ए-बे-दाम = फालतू आदमी, आलिम= ज्ञानी,  आलम-ए-इस्लाम = इस्लाम की दुनिया,  मारूफ़  = मशहूर, उर्फ़-ए-आम = मशहूरियत, पैवंद-ए-आदम = आदम के हिस्से से, दीन = विश्वास, जवानान-ए-अज़ीज़ = प्यारे जवानों, अज़मत = आदर, मुनफ़रिद= सबसे अलग, अहराम = पिरामिड, ख़र-बाज़ारियाँ = कांटो भरा रास्ता

Roman

meri bivi  kabr/qabr mai leti hai jis hangam se
wo bhi hai aaram se aur mai bhi hun aaram se

kis tarah guazar hogi ab supar aqwam se
mangati hain daam bhi wo banda-e-be-daam se

ghode nikle, unt nikle, motere nikli magar
ek bhi aalam n nikal aalam-e-islam se

phir vo jeneral election men bhi hoga kamyab
vo jo hai maruf gul-ghotu ke urf-e-am se

jaise sach kuchh bhi nahin jaise ḳhuda koa nahi
kis qadar ummide wabasta hai uncle-sam se

jaane kya paivand-e-adam se ye ab paida karen
aam aur amrūd paida kar liya badam se

diin to bachta nazar aata nahin newyork men
zulf hi apni bacha le ja.iye hajjam se

sher ka hissa agar alfaz par rakkha gaya
khelna hai jaam se aur vo bhi ḳhali jaam se

ek hi paiġham hai mera javanan-e-aziz
naam paao ilm se aram paao kaam se

husn nature ki ata azmat samar tahzib ka
munfarid hai misr apne niil aur ahram se

gar siyasat men rahin aisi hi ḳhar-bazariyan
parliamenten ḳharidi ja.engi nilam se - Syed Zameer Jafri

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