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आज श्री कृष्ण बिहारी 'नूर' साहब की 14 वीं पुण्य तिथि है, उनकी स्मृतियाँ और आशीर्वाद हम सभी के साथ हैं,उनके साथ गुज़रे हुए पल अक्सर सामने आ जाया करते हैं और ऐसा लगने लगता है जैसे यहीं कहीं आस पास हैं | आज श्रद्धांजलि स्वरूप उनकी एक नज़्म प्रस्तुत है :
यह नज़्म आपके शिष्य कृष्ण कुमार नाज़ की facebook wall से ली गयी है |

कह दो मंदिर में चले आएँ पुजारी सारे
आज देवी ने पुकारा है परस्तारों को
धर्म वालों को,ख़ुदा वालों को,दीं वालों को
गर्दन-ए-ज़ुल्म पे चलती हुई तलवारों को

आज कुछ गोशों से मंदिर के धुआँ उठता है
ज़ेहर फैला है फ़ज़ाओं में कि दम घुटता है
नींद क्यों उचटी है देवी की ये क़िस्सा क्या है
ये सुकूत और ये सन्नाटा बड़ा धोका है
कह दो मंदिर में चले आएँ पुजारी सारे

देख लो आके ये मंज़र जो हो दिल पर क़ाबू
माँ के चेहरे पे ये बिखरे हुए उलझे गेसू
ये अंधेरों से लिपटते हुए रौशन पहलू
आज पत्थर की भी आँखों से रवाँ हैं आँसू

अजनबी लोगों ने मंदिर में क़दम रक्खा है
चंद नापाक इरादों ने इधर देखा है
ये न महसूस हो माता को कि वो तनहा है
ग़ैर से है मगर अपनों से कहाँ परदा है
कह दो मंदिर में चले आएँ पुजारी सारे

बुलहवस आए हैं नापाक इरादे लेकर
हो गई हद कि हुए जाते हैं हद से बाहर
वादी-ए-अम्न-अमाँ में भी लिए हैं ख़ंजर
चीख़ उट्ठे हैं जो सीमा के लिए हैं पत्थर

सुन सको गर तो सुनो दर्द में डूबी धड़कन
बढ़ती ही जाती है अब माँ के ह्रदय की उलझन
तमतमाया हुआ चेहरा है जबीं पर है शिकन
तेज़ है आँच न जल जाए कहीं पैराहन
कह दो मंदिर में चले आएँ पुजारी सारे

माँ की इस्मत की हिफ़ाज़त का सवाल उट्ठा है
अपनी इज़्ज़त की हिफ़ाज़त का सवाल उट्ठा है
अब मुहब्बत की हिफ़ाज़त का सवाल उट्ठा है
आदमीयत की हिफ़ाज़त का सवाल उट्ठा है

अपनी तहज़ीब-ओ-तमद्दुन को बचाने के लिए
अम्न की राह को हमवार बनाने के लिए
अपने ही वास्ते क्या सारे ज़माने के लिए
ज़िन्दगी दे दो नई ज़िन्दगी पाने के लिए
कह दो मंदिर में चले आएँ पुजारी सारे

माँ का कहना है कि पूजा का तरीक़ा बदलो
भेंट करना है तो हथियार लो सोना छोड़ो
आरती के लिए ख़ुद आरती बन कर आओ
गंगाजल की जगह पाकीज़ा लहू छिड़काओ

माँ की पूजा है यही शाख़ से गुल हो न जुदा
तोड़ कर फूल चढ़ाने से उसे दुख होगा
अब हवन के लिए ये दूब ये चन्दन कैसा
आहुति के लिए सर काट लो ग़द्दारों का
कह दो मंदिर में चले आएँ पुजारी सारे

सुर्ख़ आँधी से न इस तरह: निकल पाएँगे
काम अब घी के चराग़ों से न चल पाएँगे
दीपकों को जो लहू दोगे तो जल जाएँगे
फिर अँधेरे न उजालों को निगल पाएँगे

बढ़ के रुख़ मोड़ दो तूफ़ानों से डरना कैसा
आज इंसानों को हैवानों से डरना कैसा
साथ अपने हैं तो बेगानों से डरना कैसा
तुम हक़ीक़त हो तो अफ़सानों से डरना कैसा
कह दो मंदिर में चले आएँ पुजारी सारे

अब ये ग़फ़लत का ज़माना नहीं,हुशियार रहो
वक़्त का है ये तक़ाज़ा कि ख़बरदार रहो
हो मसर्रत कि अलम, साहब-ए-किरदार रहो
जाग उट्ठे हो तो कुछ देर तो बेदार रहो

तुम को ईमाँ की क़सम,तुमको मुहब्बत की क़सम
तुमको पूजा की क़सम तुमको इबादत की क़सम
तुमको धरती की क़सम,धरती की जन्नत की क़सम
मुख़्तलिफ़ क़िस्म की इन हाथों में ताक़त की क़सम
कह दो मंदिर में चले आएँ पुजारी सारे

इन हवस वालों की नीयत का भरोसा क्या है
कब बदल जाए सियासत का भरोसा क्या है
हो न हाथों में तो क़िसमत का भरोसा क्या है
सोचो माँगी हुई ताक़त का भरोसा क्या है

आसमानों से है उम्मीद पयाम आएँगे
देवता लेके कोई ताज़ा निज़ाम आएँगे
अब रसूल आएँगे दुनिया में न राम आएँगे
सिर्फ़ इंसान ही इंसान के काम आएँगे
कह दो मंदिर में चले आएँ पुजारी सारे

ज़ीस्त से होना है रुख़सत बड़े अरमान के साथ
मौत बरहक़ है मगर आए तो फिर आन के साथ
डूबने वालो! सफ़ीना रहे तूफ़ान के साथ
ज़िन्दगी मौत की आग़ोश में हो शान के साथ

माँ की ख़्वाहिश पे चलोगे तो दुआ पाओगे
हर तरफ़ अपने मुआफ़िक़ ही हवा पाओगे
यूँ अगर मिट भी गए तुम तो बक़ा पाओगे
वरना मरने को तो मर जाओगे क्या पाओगे
कह दो मंदिर में चले आएँ पुजारी सारे
- कृष्ण बिहारी 'नूर'

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