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अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस पर मुहम्मद अल्वी साहब की लिखी एक नज्म पेश है :

घर से बाहर
आँगन में
खाट पे बैठी
तीन औरतें
खुसुर-पुसुर करती हैं!

एक मोटी है
दूसरी लम्बी
तीसरी क़द की छोटी है
छोटी दोनों हाथ हिला के
मुँह ही मुँह में
जाने क्या कहती है

लम्बी सर से सर जोड़े
बड़े चाव से सुनती है
मोटी नाक पे उँगली धर के
बिना सुने ही
मटकी सा सर धुनती है

पास ही इक नन्ही सी चिड़िया
गिरे पड़े तिनके चुनती है! -मुहम्मद अल्वी

Roman

ghar se bahar
aangan me
khat pe baithi
teen aurate
khusur-pusur karti hai

ek moti hai
dusri lambi hai
tisri kad ki chhoti hai
chhoti dono hath hila ke
munh hi muh me
jaane kya kahti hai


lambi sar se sar jode
bade chaav se sunati hai
moti naak pe ungali dhar ke
bina sune hi
matki sa sar dhunti hai

paas hi ek nanhi si chidiya
gir pade tinke chunti hai - Muhmmad Alvi

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