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श्रीराम बोलना भी सियासत में आ गया - गोपाल कृष्ण सक्सेना "पंकज"
श्रीराम बोलना भी सियासत में आ गया - गोपाल कृष्ण सक्सेना "पंकज"

गोपाल कृष्ण सक्सेना २६ फरवरी १९३४ को उत्तर प्रदेश के उरई में जन्मे | आप ने अंग्रेजी साहित्य में ...

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नई हुई फिर रस्म पुरानी दीवाली के दीप जले - फ़िराक गोरखपुरी
नई हुई फिर रस्म पुरानी दीवाली के दीप जले - फ़िराक गोरखपुरी

नई हुई फिर रस्म पुरानी दिवाली के दीप जले शाम सुहानी रात सुहानी दिवाली के दीप जले धरती का रस डो...

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उसकी खुशबू मेरी गज़लों में सिमट आई है - इकबाल अशहर
उसकी खुशबू मेरी गज़लों में सिमट आई है - इकबाल अशहर

उसकी खुशबू मेरी गज़लों में सिमट आई है नाम का नाम है रुसवाई की रुसवाई है दिल है एक और दो आलम का तमन्नाई है दोस्त का दोस्त है हरजाई का हरज...

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तंग आ चुके हैं कशमकश ज़िन्दगी से हम  - साहिर लुधियानवी
तंग आ चुके हैं कशमकश ज़िन्दगी से हम - साहिर लुधियानवी

तंग आ चुके हैं कशमकश ज़िन्दगी से हम ठुकरा न दें जहां को कहीं बेदिली से हम लो, आज हमने तोड़ दिया रिश्ता-ए-उम्मीद लो, अब कभी गिला न करेंगे...

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लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में - बहादुर शाह ज़फर
लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में - बहादुर शाह ज़फर

लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में किसकी बनी है आलम-ए-ना-पाएदार में कह दो न इन हसरतो से कही और जा बसे इतनी जगह कहा है दिन –ए-दागदार मे...

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सीखी नई ज़बान, वतन से जुदा हुए  - सलमान अख्तर
सीखी नई ज़बान, वतन से जुदा हुए - सलमान अख्तर

सीखी नई ज़बान, वतन से जुदा हुए जीने की दौड़-धुप में हम क्या से क्या हुए फुटपाथ पर पड़े थे तो खाते...

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आँख को जाम लिखो ज़ुल्फ को बरसात लिखो -  निदा फाजली
आँख को जाम लिखो ज़ुल्फ को बरसात लिखो - निदा फाजली

निदा  फाजली साहब को जन्मदिन की हार्दिक बधाई | आप सभी के लिए उनकी यह गज़ल आँख को जाम लिखो ज़ुल्फ को बरसात लिखो जिस से नाराज हो उस शख्स की ह...

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न हो शोहरत तो गुमनामी का भी खतरा नहीं होता  - अहमद वसी
न हो शोहरत तो गुमनामी का भी खतरा नहीं होता - अहमद वसी

न हो शोहरत तो गुमनामी का भी खतरा नहीं होता बहुत मशहूर होना भी बहुत अच्छा नहीं होता, फसादों,हादसों,जंगो में ही हम एक होते है कोई आफत ना ...

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आवाज़ दो हम एक हैं  - जाँ निसार अख़्तर
आवाज़ दो हम एक हैं - जाँ निसार अख़्तर

एक है अपनी ज़मीं ,एक है अपना गगन एक है अपना जहाँ, एक है अपना वतन अपने सभी सुख एक हैं, अपने सभी ग़म एक हैं आवाज़ दो हम एक हैं ये वक़्त ...

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गांधीजी के जन्मदिन पर -दुष्यंत कुमार
गांधीजी के जन्मदिन पर -दुष्यंत कुमार

मैं फिर जनम लूँगा फिर मैं इसी जगह आऊँगा उचटती निगाहों की भीड़ में अभावों के बीच लोगों की क्षत-विक्षत पीठ सहलाऊँगा लँगड़ाकर चलते हुए प...

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