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मैं फिर जनम लूँगा
फिर मैं
इसी जगह आऊँगा
उचटती निगाहों की भीड़ में
अभावों के बीच
लोगों की क्षत-विक्षत पीठ सहलाऊँगा
लँगड़ाकर चलते हुए पावों को
कंधा दूँगा
गिरी हुई पद-मर्दित पराजित विवशता को
बाँहों में उठाऊँगा ।

इस समूह में
इन अनगिनत अनचीन्ही आवाजों में
कैसा दर्द है
कोई नहीं सुनता!
पर इन आवाजों को
और इन कराहों को
दुनिया सुने मैं ये चाहूँगा ।

मेरी तो आदत है
रोशनी जहाँ भी हो
उसे खोज लाऊँगा
कातरता, चुप्पी या चीखें,
या हारे हुओं की खीज
जहाँ भी मिलेगी
उन्हें प्यार के सितार पर बजाऊँगा ।

जीवन ने कई बार उकसाकर
मुझे अनुल्लंघ्य सागरों में फेंका है
अगन-भट्ठियों में झोंका है,
मैने वहाँ भी
ज्योति की मशाल प्राप्त करने के यत्न किए
बचने के नहीं,
तो क्या इन टटकी बंदूकों से डर जाऊँगा ?
तुम मुझको दोषी ठहराओ
मैने तुम्हारे सुनसान का गला घोंटा है
पर मैं गाऊँगा
चाहे इस प्रार्थना सभा में
तुम सब मुझपर गोलियाँ चलाओ
मैं मर जाऊँगा
लेकिन मैं कल फिर जनम लूँगा
कल फिर आऊँगा । - दुष्यंत कुमार

Roman

mai fir janm lunga
fir me
isi jagah aaunga
uchtati nigao ki bhid me
abhavo ke beech
logo ki kshat-vichat pith sahlaunga
langdakar chalte hue pavo ko
kandha dunga
giri hui pad-mardit parajit vivshata ko
baaho me uthaunga

is samuh me in anginat anchinhi aawajo me
kaisa dard hai
koi nahi sunta!
par in aawajo ko
aur in karaho ko
duniya sune mai ye chahunga |

meri to aadat hai
roshni jaha bhi ho
use khoj launga
katrata, chuppi ya chikhe
ya hare huo ki kheej
jaha bhi milegi
unhe pyar ke sitar bajaunga

jeevan ne kai baar uksakar
mujhe anullnghay sagro me feka hai
agan-bhattiyo me jhoka hai
maine waha bhi
jyoti ki mashal prapt karne ke yatn kiye
bachne ke nahi,
to kya in tatki banduko se dar jaunga?
tum mujhko doshi thahrao
maine tumhare sunsan ka gala ghota hai
par mai gaunga
chahe prathna sabha me
tum mujh par goliya chalao
mai mar jaunga
lekin mai kal fir janm lunga
kal fir aaunga - Dushyant Kumar
#jakhira

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