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पहला सा वो ज़मीं का न वो आसमां का रंग
दो दिन में ही बदल गया सारे जहा का रंग

तेवर ही और हो गए अपने पराए के
किस-किस का अब गिला हो की बदला जहा का रंग

उड़ने लगी हवाइयां चेहरे पे यार के
ऐसा था मेरी दर्द भरी दास्ता का रंग

परकैंच कर के छोड़ा है उसने बहार में
अपने लिए तो अब भी वही है खिंज़ा का रंग

जामे शराब बे-खुदी मै ने पिया है शाद
उस्ताद से क्यों न मिले मेरे बयाँ का रंग - मुरलीधर शाद / लाला मुरलीधर शाद

Roman

Pahla sa wo zameen ka n wo aasmaan ka rang
do din me hi badal gaya sare jaha ka rang

tewar i aur ho gaye apne paraye k
kis kis ka ab gila ho ki badla jaha ka rang

udne lagi hawaiya chehre yaar ke
aisa tha meri dard bhari dasta ka rang

parkainch kar ke chhoda hai usne bahar me
apne liye to ab bhi wahi hai khiza ka rang

zame sharab be-khudi mai ne piya hai shad
ustad se kyo n mile mere bayaan ka rang - Murlidhar Shad

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