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बड़ी मशहूर ग़ज़ल है आलोक श्रीवास्तव जी की बाबूजी आप सबके लिए पेश है :

घर की बुनियादें, दीवारें, बामो-दर थे बाबूजी
सबको बांधे रखने वाला ख़ास हुनर थे बाबूजी

तीन मुहल्लों में उन जैसी क़द-काठी का कोई न था
अच्छे-ख़ासे, ऊँचे-पूरे क़द्दावर थे बाबूजी

अब तो उस सूने माथे पर कोरेपन की चादर है
अम्माजी की सारी सज-धज, सब ज़ेवर थे बाबूजी

भीतर से ख़ालिस जज्बाती और ऊपर से ठेठ-पिता
अलग, अनूठा, अनबूझा-सा इक तेवर थे बाबूजी

कभी बड़ा सा हाथ ख़र्च थे, कभी हथेली की सूजन
मेरे मन का आधा साहस, आधा डर थे बाबूजी - आलोक श्रीवास्तव

Roman

Ghar ki buniyade, deeware, bamo-dar the babuji
sabko bandhe rakhne wala khas hunar the babuji

teen uhllo me un jaisi kad kathi ka koi n tha
achche-khase, unche-pure kaddawar the babuji

ab to us sune mathe par korepan ki chadar hai
ammaji ki sari saj-dhaj, sab zewar the babuji

bhitar se khalis jazbati aur upar se theth pita
alag, anutha, anbujha sa ik tewar the babuji

kabhi bada sa haath kharch the, kabhi hatheli ki sujan
mere man ka aadha sahas, aadha dar the babuji - Aalok Shrivastav

#jakhira

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