0
इस दर्ज़ा हुआ ख़ुश के डरा दिल से बहुत मैं
ख़ुद तोड़ दिया बढ़ के तमन्नाओं का धागा

ता-के न बनूँ फिर कहीं इक बंद-ए-मजबूर
हाँ कैद़-ए-मोहब्बत से यही सोच के भागा

ठोकर जो लगी अपने अज़ाएम ने सँभाला
मैं ने तो कभी कोई सहारा नहीं माँगा

चलता रहा मैं रेत पे प्यासा तन-ए-तन्हा
बहती रही कुछ दूर पे इक प्यार की गंगा

मैं तुझ को मगर जान गया था शम्मा-ए-तमन्ना
समझी थी के जल जाएगा शाएर है पतिंगा

आँखों में अभी तक है ख़ुमार-ए-ग़म-ए-जानाँ
जैसे के कोई ख़्वाब-ए-मोहब्बत से है जागा

जो ख़ुद को बदल देते हैं इस दौर में ‘बाकिर’
करते हैं हक़ीक़त में वो सोने पे सुहागा - बाक़र  मेहंदी

Roman

is darja hua khush ke dara dil se bahut mai
khud tod diya badh ke tamnnao ka dhaga

ta ke n banu kahu ek band-e-majboor
haa kaid-e-mohbbat se yahi soch ke bhaga

thokar jo lagi apne anjaam ne sambhala
mai ne to kabhi koi sahara nahi manga

chalta raha mai ret pe pyasa tan-e-tanha
bahti rhi kuch door pe ik pyar ki ganga

mai tujh ko magar jaan gya tha shamma-e-tamnna
samjhi thi ke jal jaega shaayar hai patinga

aankho me abhi tak hai khumar-e-gam-e-jaana
jaise ke koi khwab-e-mohbbat se hai jaaga

jo khud ko badal dete hai is dour me 'baaqar'
karte hai haqiqat me wo sone pe suhaga - Baqar Mehandi
#jakhira

Post a Comment Blogger

 
Top