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तहलीलघुल जाना


मेरी माँ अब मिट्टी के ढेर के नीचे सोती है
उसके जुमले, उसकी बातें ,
जब वह ज़िंदा थी, कितना
बरहम गुस्सा
करती थी
मेरी
रौशन-तबई अक्लमंदी
, उसकी
जिहालत अनपढ़ता


हम दोनों के बीच एक दीवार थी जैसे

रात को ख़ुशबू का झोंका आए, जि़क्र न करना
पीरों की सवारी जाती है,
दिन में बगूलों की ज़द में मत आना
साये का असर हो जाता है
बारिश-पानी में घर से बाहर जाना तो चौकस रहना
बिजली गिर पड़ती है- तू पहलौठी का बेटा है

जब तू मेरे पेट में था, मैंने एक सपना देखा था
गोद अपनी साँप लिए बैठी हूँ । तेरी उम्र बड़ी लंबी है
लोग मुहब्बत करके भी तुझसे डरते रहेंगे

मेरी माँ अब ढेरों मन मिट्टी के नीचे सोती है
साँप से मैं बेहद
ख़ाइफ़ डरा हुआ
हूं
माँ की बातों से घबराकर मैंने अपना सारा ज़हर उगल डाला है
लेकिन जब से सबको मालूम हुआ है मेरे अंदर कोई ज़हर नहीं है
अक्सर लोग मुझे
अहमक बेवकूफ
कहते हैं। - अख्तर उल ईमान

Roman

Meri maa ab mitti ke dher ke niche soti hai
uske jumle, uski baate,
jab wah zinda thi, kitna barham karti thi
meri roushan-tabai, uski zihalat
ham dono ke beech ek deewar thi jaise

raat ko khushboo ka jhoka aaye, jikra n karna
peero ki swari jati hai,
din me bagulo ki zad me mat aana
saaye ka asar ho jata hai
barish pani me ghar se bahar jana to choukas rahna
bijli gir padti hai tu pahlouthi ka beta hai

jab tu mere pet me tha, maine ek sapna dekha tha
god apni saap liye baithi hu | teri umra badi lambi hai
log mohbbat karke bhu tujhse darte rahenge

meri maa ab dhero man mitti ke niche soti hai
saap se mai behad khaif hu
maa ki baato se ghabrakar maine apna sara zahar ugal dala hai
lekin jab se sabk malum hua hai mere andar koi zahar nahi hai
aksar log mujhe ahmak kahte hai - Akhtar Ul Iman

#jakhira

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