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तहलील ( मेरी माँ) अख्तर-उल-ईमान
तहलील ( मेरी माँ) अख्तर-उल-ईमान

तहलील घुल जाना मेरी माँ अब मिट्टी के ढेर के नीचे सोती है उसके जुमले, उसकी बातें , जब वह ज़िंदा थी, कितना बरहम गुस्सा करती थी मेरी र...

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इंसानियत तो एक है मजहब अनेक है- मुनिकेश सोनी
इंसानियत तो एक है मजहब अनेक है- मुनिकेश सोनी

इंसानियत तो एक है मजहब अनेक है। ये ज़िन्दगी इसको जीने के मक़सद अनेक है।। ना खाई ठोकरे वो रह गया नाकाम । ठोकरे खाकर सँभलने वाले अनेक हैं।।...

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जब मेरे घर के पास कही भी नगर न था - कुंवर बैचैन
जब मेरे घर के पास कही भी नगर न था - कुंवर बैचैन

जब मेरे घर के पास कही भी नगर न था तो इस तरह राह में लूटने का डर न था जंगल में जंगलो की तरह का सफर न था सूरत में आदमी की कोई जानवर न थ...

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ज़िन्दगी जब तलक तमाम न हो - राज़िक़ अंसारी
ज़िन्दगी जब तलक तमाम न हो - राज़िक़ अंसारी

ज़िन्दगी जब तलक तमाम न हो रास्ते में कहीं क़याम न हो घर में रिश्ते बिखर चुके लेकिन दुश्मनों में ख़बर ये आम न हो कुछ ताअल्लुक़ नहीं...

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