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उनकी पूर्ण जीवनी यहाँ पढ़ सकते है Click here
निदा फ़ाज़ली शायरी को जानने वालो के लिए ये कोई नया नाम नहीं है और यह नाम उर्दू शायरी में एक अलग मुकाम रखता है । आप वो शायर है जो फ़ारसी उर्दू जो की उर्दू शायरी में बरसो से चली आ रही थी उसे न चुनकर उसे एक सरल और समझने लायक शब्दों में ढालकर ग़ज़ल, नज्म और दोहे कहते थे ।
आपका जन्म 12 अक्टुम्बर 1938 को ग्वालियर में हुआ और आपकी मृत्यु मुंबई में दिल का दौरा आने से 8 फरवरी 2016 72 वर्ष की उम्र में हुई।
जी हां यह वही दिन है जिस दिन जगजीत सिंह जी का जन्म दिवस है ।
एक बार जब वे पाकिस्तान मुशायरे में शामिल होने गए तब उनके कहे एक शेर पर वहा कट्टरपंथियों ने उनका घेराव कर लिया शेर था
"घर से मस्जिद है बड़ी दूर, चलो ये कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए॥"

और अपना विरोध प्रकट करते हुए कहने लगे की क्या आप किसी बच्चे को अल्लाह से बड़ा समझते हैं? निदा ने उत्तर दिया कि मैं केवल इतना जानता हूँ कि मस्जिद इंसान के हाथ बनाते हैं जबकि बच्चे को अल्लाह अपने हाथों से बनाता है। ऐसे थे निदा फ़ाज़ली साहब ।

आपसे मेरी मुलाकात तो कभी नहीं हुई बस आपसे फ़ोन पर ही बातचीत हुई थी आप 2008 में रूपांकन (इंदौर ) आये थे तब आपने यह शेर लिख था
नक्शा लेकर हाथ में बच्चा है हैरान
कैसे दीमक खा गयी सारा हिन्दुस्तान

निदा फ़ाज़ली साहब सिर्फ अपनी शायरी से ही नहीं अपनी सोच से भी अलग पहचान रखते थे । आपने कई लेख लिखे
आपकी मृत्यु पर कई शायरों ने कुछ कहा जो पेश है :-

"निदा साहब का सम्मान हिंदी-उर्दू में योगदान के लिए एक समान था। वे लिखते उर्दू में थे पर एमए हिंदी में किया था। उनके दिल में मीर, मीरा, तुलसी, रहीम, कबीर एक साथ धड़कते थे। उनकी लेखनी में जमीनी सोच वाले शब्द फूटते थे। ऐसी शायरी, जो हर कोई समझ जाए। परंपरा में रहकर कलम चलाते थे, जिसमें दोहे-नज्म़, गज़ल... सब कुछ मिलेगा। वे अपने तय किए सांचे में बात करते थे, पर दस बार कही बात कभी नहीं लिखी। वे अगली पीढ़ी के शायर थे। उन्होंने अपनी रचनाओ को किसी भाषा के बंधन में नहीं बाँधा । उन्होंने फ़ारसी जबान को हिंदी और उर्दू के साथ समझने में आसान बना दिया, उनकी लिखी गज़ल है-
"दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है
मिल जाए तो मिट्टी है खो जाए तो सोना है।" - जावेद अख्तर

निदा फाजली 50 बरसों से मुसलसल लिख रहे थे। उनकी शिनाख्त बतौर उर्दू के शायर की रही। लेकिन उन्होंने उर्दू को ओढ़ा नहीं। उनकी जुबान कठिन उर्दू, फारसी या तुर्की नहीं है। उन्होंने आम हिंदुस्तानी जुबान में लिखा। इसीलिए उन्हें जितना उर्दू में पढ़ा गया उतना ही हिंदी में भी पढ़ा गया। वे उर्दू शायरी और हिंदी अदब पर समान अधिकार से बात करते थे। पिछले 400 सालों से उर्दू में एक खास फ्रेम, रिवाज और अंदाज मेंं लिखा जा रहा है। लेकिन निदा का लहजा अलहदा था। उन्होंने किसी भी फ्रेम से अलग, अपने रंगों मे लिखा। वे चेहरे और आंखों से शायर थे। जिंदादिल इंसान। -डॉ. राहत  इंदौरी 

निदा साहब उर्दू की बुलंद आवाज़ है और रहेंगे मै  ये मोतबर (विश्वास) नहीं करता कि  वे नहीं रहे । वे भले ही हमारे बीच शारीरिक रूप से न हो पर वो उनके काम, शायरी , नज्म, और दोहो के साथ हमेशा ज़िंदा रहेंगे ।- प्रो. वसीम बरेलवी 
#jakhira

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  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " स्वधर्मे निधनं श्रेयः - ब्लॉग बुलेटिन " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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