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इक याद की मौजूदगी सह भी नहीं सकते  - साक़ी फारुकी
इक याद की मौजूदगी सह भी नहीं सकते - साक़ी फारुकी

इक याद की मौजूदगी सह भी नहीं सकते ये बात किसी और से कह भी नहीं सकते तू अपने गहन में है तो मैं अपने गहन में दो चांद हैं इक अब्र में रह भ...

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सुब्ह आँख खुलती है एक दिन निकलता है - हसन आबिदी
सुब्ह आँख खुलती है एक दिन निकलता है - हसन आबिदी

Hasan Abidi हसन आबिदी साहब पकिस्तान के मशहूर शायर और पत्रकार थे आपका जन्म 7 जुलाई 1929 को जौनपु...

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चिपचिपे दूध से नहलाते है - गुलज़ार
चिपचिपे दूध से नहलाते है - गुलज़ार

कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर आप सभी को हार्दिक बधाईयाँ इस अवसर पर गुलज़ार साहब कि एक नज्म पेश है पढ़ि...

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तादाद में हिन्दू न मुसलमान लिखे जाएं - राज़िक़ अंसारी
तादाद में हिन्दू न मुसलमान लिखे जाएं - राज़िक़ अंसारी

तादाद में हिन्दू न मुसलमान लिखे जाएं कितने है अपने गांव में इंसान लिखे जाएं दिल के तमाम ज़ख़्म...

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गुज़र गए हैं जो मौसम कभी न आएँगे - आशुफ्ता चंगेजी
गुज़र गए हैं जो मौसम कभी न आएँगे - आशुफ्ता चंगेजी

गुज़र गए हैं जो मौसम कभी न आएँगे तमाम दरिया किसी रोज़ डूब जाएँगे सफ़र तो पहले भी कितने किये मगर इ...

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हकीम मोमिन खां ‘मोमिन’- डा. रंजन ज़ैदी
हकीम मोमिन खां ‘मोमिन’- डा. रंजन ज़ैदी

क हते है कि शायर जन्मजात शायर होता है. किन्तु उसकी शायरी उसके परिवेश और वातावरण से प्रभावित होती ह...

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