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राज़िक़ अंसारी साहब इंदौर के रहने वाले है आपने अपनी शायरी की शुरुवात सन 1985 में की थी आपका जन्म 1 अप्रैल 1960 को हुआ |

मक़तल छोड़ के घर जाएं नामुमकिन है
वक़्त से पहले मर जाएं नामुमकिन है

हमदर्दी से रोज़ कुरेदे जाते हैं
ज़ख़्म जिगर के भर जाएं नामुमकिन है

ग़ेरों जैसा अपने साथ रखा वरना
हम तुझ से बाहर जाएं नामुमकिन है

मजबूरी ने बांध रखे हैं अपने हाथ
वरना तुझ से डर जाएं नामुमकिन है

दरवाज़े पर बैठी होंगी उम्मीदें
ले कर चश्मे तर जाएं नामुमकिन है - राज़िक़ अंसारी

Roman

maqtal chhod ke ghar jaye namumkin hai
waqt ke pahle mar jaye namumkin hai

hamdardi se roz kurede jate hai
jakhm jigar ke bhar jaye namumkin hai

gairo jaisa apne sath rakha warna
ham tujh se bahar jaye namumkin hai

majburi ne bandh rakhe hai apne hath
warna tujh se dar jaye namumkin hai

darwaje par baithi hogi ummide
le kar chashme tar jaye namumkin hai - Razique Anasri
#jakhira


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  1. हमदर्दी से रोज़ कुरेदे जाते हैंथ
    ज़ख़्म जिगर के भर जाएं नामुमकिन है... वाह ...बेहतरीन शायरी।

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