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आज मजदूर दिवस के मौके पर कैफ भोपाली साहब की एक नज्म पेश है या यूं कहे कोरस है "मजदूरों का कोरस" " Mazdooro ka Koras"

हैया रे हैया, हैया रे हैया
भूखा है बाबा नंगी है मैया
हैया रे हैया, हैया रे हैया

खेतों में हम है, माटी का जीवन,
मीलो में हम है लोहे का ईधन |
फौजो में हम है बनके सिपहिया,
हैया रे हैया, हैया रे हैया

मथुरा बसी, गोकुल बसाया,
गंगा का पनघट हमने बनाया |
हमसे है जिन्दा राधा कन्हैया,
हैया रे हैया, हैया रे हैया

तेलों के चश्मे हमने निकाले,
तोड़ी चट्टानें फोड़े हिमाले |
हमने घुमाया धरती का पहिया |
हैया रे हैया, हैया रे हैया

साथी न घबरा बढ़ता चला चल,
थोड़े बहुत है घनघोर बादल |
फिर इसके आगे मंजिल है भैया
हैया रे हैया, हैया रे हैया - कैफ भोपाली

Roman

Haiya re haiya, Haiya re haiya
bhukha hai baba, nangi hai maiya
Haiya re haiya, Haiya re haiya

kheto me ham hai, mati ka jeevan,
meelo me ham hai lohe ka idhan.
fouzo me ham hai banke sipahiya
Haiya re haiya, Haiya re haiya

mathura basai, gokul basaya,
ganga ka panghat hamne banaya.
hamse hai zinda radha kanhaiya
Haiya re haiya, Haiya re haiya

telo ke chashme hamne nikale
todi chattane fode himale
hamne ghumaya dharti ka pahiya
Haiya re haiya, Haiya re haiya

sathi n ghabra badhta chala chal
fir iske aage manjil hai bhaiya
Haiya re haiya, Haiya re haiya - Kaif Bhopali
#jakhira

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