0
हस्तीमल हस्ती साहब का आज जन्मदिन है इस अवसर पर उनकी यह ग़ज़ल पेश है :

तेरी शतरंज पर क्या-क्या नहीं था
मुहब्बत का ही एक मोहरा नहीं था

सजा मुझको ही मिलनी थी हमेशा
मिरे चेहरे पे ही चेहरा नहीं था

कोई प्यासा नहीं लौटा वह से
जहा दिल था, भले दरिया नहीं था

किसे कहता, तवज्जो कौन देता
मिरा गम था कोई किस्सा नहीं था

हमारे ही कदम छोटे थे वर्ना
यहाँ पर्वत कोई ऊँचा नहीं था

मै ऐसा घर रहा, अपनों की खातिर
जहा कोई अलग कमरा नहीं था

बदन तो थे बदन पर सूरते भी
मगर खुद का कोई चेहरा नहीं था

रहा फिर देर तक मै साथ उसके
भले वो देर तक ठहरा नहीं था

हवस की हद नहीं होती है "हस्ती"
तुझे जितना मिला थोडा नहीं था - हस्तीमल हस्ती

Roman

tiri shatranj par kya-kya nahi tha
muhbbat ka hi ek muhra nahi tha

saja mujhko hi milni thi hamesha
mire chehre pe hi chehra nahi tha

koi pyasa nahi louta waha se
jaha dil tha, bhale dariya nahi tha

kise kahta, tavjjo koun deta
mira gam tha koi kissa nahi tha

hamare hi kadam chhote the warna
yaha parvat koi uncha nahi tha

mai aisa ghar raha, apno ki khatir
jaha koi alag kamra nahi tha

badan to the badan par surte bhi
magar khud ka koi chehra nahi tha

raha fir der tak mai sath uske
bhel wo der tak thahra nahi tha

hawas ki had nahi hoti hai "Hasti"
tujhe jitna mila thoda nahi tha - Hastimal Hasti
#jakhira

Post a Comment Blogger

 
Top