0
सारा शगुफ्ता वो शायर है जो अपने तमाम गम और दर्द को ग़ज़ल, नज्म में तब्दील कर देती थी वे पकिस्तान की मशहूर शायर थी | आपकी मौत आज भी एक रहस्य बनी हुई है | शगुफ्ता के लेखन में कड़वाहट नहीं है, उन्होंने साहिर की तरह नहीं सोचा कि ‘तजुरबाते हवादिस की शकल में, जो कुछ जमाने ने दिया, वह लौटा रहा हूं मैं।’ गोयाकि शगुफ्ता ने अनुभवों के गरल को अपने कंठ में ऐसे साधा कि जहर उनके सोच तक नहीं पहुंचा। यह एक ऐसा लोहा है, जिसे अपने व्यक्तित्व में ढालना आसान नहीं। जो लोग औरतों को ‘मोम की गुडिय़ा’ समझते हैं, उनके लिए शगुफ्ता एक चुनौती हैं।

आज महिला दिवस पर आपकी एक नज्म पेश है -

इज़्ज़त की बहुत-सी क़िस्में हैं
घूंघट, थप्पड़, गंदुम
इज़्ज़त के ताबूत में क़ैद की मैंखें ठोंकी गई हैं
घर से लेकर फुटपाथ तक हमारा नहीं
इज़्ज़त हमारे गुज़ारे की बात है
इज़्ज़त के नेज़े से हमें दागा जाता है
इज़्ज़त की कनी हमारी ज़बान से शुरू होती है
कोई रात हमारा नमक चख ले
तो एक जिंदगी हमें बे जायका रोटी कहा जाता है
ये कैसा बाजार है

की रंगसाज़ ही फीका पड़ा है
ख़ला की हथेली पे पतंगें मर रही हैं
मैं क़ैद में बच्चे जनती हूँ
जाइज़ औलाद के लिए ज़मीन खिलंडरी होनी चाहिए
तुम डर में बच्चे जनती हो इसलिए आज तुम्हारी कोई नस्ल नहीं
तुम जिस्म के एक बंद से पुकारी जाती हो
तुम्हारी हैसियत में तो चाल रख दी गई है
एक ख़ूबसूरत चाल

झूठी मुस्कराहट तुम्हारे लबों पे तराश दी गई है
तुम सदियों से नहीं रोईं
क्या माँ ऎसी होती है
तुम्हारे बच्चे फीके क्यों पड़े हैं
तुम किसी कुन्बे की माँ हो
रेप की, क़ैद की, बटे हुए जिस्म की
या ईटों में चुनी हुई बेटियों की,
बाज़ार में तुम्हारी बेटियाँ

अपने लहू से थूक गूंधती हैं
और अपना गोश्त खाती हैं
ये तुम्हारी कौन-सी आंखें हैं
ये तुम्हारे घर की दीवार की कौन-सी चुनाई है
तुमने मेरी हंसी में तआरूफ़ रखा
और अपने बेटे का नाम सिक्का-ए-राइजुल -वक़्त
आज तुम्हारी बेटी अपनी बेटियों से कहती है
मैं अपनी बेटी की ज़बान दागूँगी
लहू थूकती औरत धात नहीं
चूड़ियों की चोर नहीं
मैदान मेरा हौसला है
अंगारा मेरी ख़्वाहिश
हम सर पे कफ़न बाँध कर पैदा हुए हैं
कोई अंगूठी पहन कर नहीं
जिसे तुम चोरी कर लोगे- सारा शगुफ़्ता
मायने
गंदुम=गेहूं, मैंखें= कीलें, रंगसाज़ =रंग बनाने वाला, ख़ला =अंतरिक्ष, तआरूफ़= परिचय,  सिक्का-ए-राइजुल -वक़्त =वो सिक्का जो उस समय चल रहा हो

Roman

ijjat ki bahut si kisme hai
ghunghat, thappad, gandum
ijjat ke tabut me kaid ki maikhe thoki gayi hai
ghar se lekar futpath tak hamara nahi
ijjat hamare gujare ki baat hai
ijjat ki kani hamari jabaan se shuru hoti hai
koi raat hamara namak chakh le
to ek zindgi hame be zayka roti kaha jata hai
ye kaisa bazar hai

ki rangsaaj hi feeka pada hai
khala ki hatheli pe patange mar rahi hai
mai kaid me bachche janti hu
zayaz oulad ke liye jameen khilandari honi chahiye
tum dar me bachche janti ho isliye tumhari koi nasl nahi
tum jism ke ek band se pukari jati ho
tumhari haisiyat me to chal rakh di gayi hai
ek khubsurat chaal

jhuti muskurahat tumhare labo pe tarash di gayi hai
tum sadiyo se nahi roi
kya maa aisi hoti hai
tumhare bachche feeke kyo pade hai
tum kisi kunbe ki maa ho
rep ki, kaid ki, bate hue jism ki,
yaa ito me chuni hui betiyo ki,
bazar me tumhari betiya

apne lahu se thuk gundhti hai
aur apna gosht khati hai
ye tumhari koun si aankhe hai
ye tumhare ghar ki deewar me kooun si chunai hai
tumne meri hasi me apna tawaruf rakha
aur apne bete ka naam sikka-e-raizul-waqt
aaj tumhari beti ki juban dagugi
lahu thukti aurat dhaat nahi
chudiyo ki chor nahi
maidan mera housla hai
angara meri khwahish
ham sar pe kafan baandh kar paida hui hai
koi anguthi pahan kar nahi
jise tum chori kar loge - Sara Shagufta
#jakhira

Post a Comment Blogger

 
Top