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आज शहरयार साहब का जन्मदिन है इस मौके पर यह ग़ज़ल पेश है :-

वो जो वह एक अक्स है सहमा हुआ डरा हुआ
देखा है उसने गौर से सूरज को डूबता हुआ

तकता हु कितनी देर से दरिया को मैं करीब से
रिश्ता हरेक ख़त्म क्या पानी से प्यास का हुआ

होठो से आगे का सफर बेहतर है मुल्तवी करे
वो भी है कुछ निढाल सा मैं भी हु कुछ थका हुआ

कल एक बरहना शाख से पागल हवा लिपट गयी
देखा था खुद ये सानिहा, लगता है जो सुना हुआ

पैरो के निचे से मेरे कब की जमीं निकल गयी
जीना है और या नहीं अब तक न फैसला हुआ - शहरयार
मायने
सानिहा- दुर्घटना

Roman

wo jo waha ek aks hai sahma hua dara hua
dekha hai usne gour se suraj ko dubta hua

takta hu kitni der se dariya ko mai karib se
rishta harek khtm kya paani se pyas ka hua

hotho se aage ka safar behtar hai multvi kare
wo bhi hai kuch nidhal sa mai bhi hu kuch thaka hua

kal ek barhana shakh se paagal hawa lipat gayi
dekha tha khud ye saniha, lagta hai jo suna hua

pairo ke niche se mere kab ki jamin nikal gayi
jeena hai aur ya nahi ab tak n faisla hua- Shaharyar

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  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन त्रासदी का एक साल - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. बहुत सुंदर
    क्या कहने

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