0
कहाँ ले जाऊँ दिल दोनों जहाँ में इसकी मुश्क़िल है ।
यहाँ परियों का मजमा है, वहाँ हूरों की महफ़िल है ।

इलाही कैसी-कैसी सूरतें तूने बनाई हैं,
हर सूरत कलेजे से लगा लेने के क़ाबिल है।

ये दिल लेते ही शीशे की तरह पत्थर पे दे मारा,
मैं कहता रह गया ज़ालिम मेरा दिल है, मेरा दिल है ।

जो देखा अक्स आईने में अपना बोले झुँझलाकर,
अरे तू कौन है, हट सामने से क्यों मुक़ाबिल है ।

हज़ारों दिल मसल कर पाँवों से झुँझला के फ़रमाया,
लो पहचानो तुम्हारा इन दिलों में कौन सा दिल है । - अकबर इलाहाबादी

Roman

kahaa le jau dil dono jahaan me mushkil hai
yahaa pariyo ka majma hai, wahaa huron ki mahfil hai

ilahi kaisi-kaisi surate tune banai hai
har surat kaleje se laga lene ke kabil hai

ye dil lete hi shishe ki tarah patthar pe de mara,
mai kahta rah gaya, jalim mera dil hai, mera dil hai

jo dekha aks aaine me apna bole jhunjhlakar,
are tu koun hai, hat samne se kyo mukabil hai

hajaro dil masal kar paanvo se jhunjhla ke farmaya,
lo pahchano tumhara in dilo me koun sa dil hai - Akbar Ilahbadi

Post a Comment Blogger

 
Top