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जिंदगी में मुझे दूसरों के बाज-बाज अशआर ऐसे मिले, जिन्हें मुझे अपना कहने का बहुत दिल चाहा, बस यु ही जैसे किसी प्यारे बच्चे को गोद में लेकर आप उसके वालिदें के सामने कह देते है कि यह बच्चा तो मेरा है और फिर उसी जज्बे से आप कहते है कि उसे तो मुझे दे दीजिए, तो वे कितने खुश होते है | वे अच्छी तरह जानते है कि न आप बच्चे को ले जायेंगे, न वे आपको ले जाने देंगे | सौ में से कोई एक कहता है कि ले जाइये, मगर रात को ले आइयेगा, आपको बहुत परेशान करेगा | आप जरुर बच्चे को घर लायेंगे, उसे रोने न देंगे और हर तरह से उसको बहलाएँगे, खिलौनों से, मिठाइयो से, किस्से कहानियों से, यही नहीं आप उसको खूब सजा-सवारकर रात होते ही उसके माँ-बाप के पास पंहुचा देंगे | भाई, शेर भी तो एक ओलाद ही होता है, आपका हो या मेरा | ऐसी ओलाद जिसे कभी कोई किसी को नहीं देता | आप जबरदस्ती हासिल कर ले तो अलग बात है |

1977 इस्वी के आम चुनाव का नतीजा सुनकर बेहद अफ़सोस हुआ | मरकज के करीब-करीब वो सारे वजीर शिकस्त की जद में आ गए | जिन्हें खुशफहमी थी कि वे आवाम के दिलो में तख्सीर कर चुके है, मगर वे ये नहीं जानते थे कि आवाम कि निगाह उनके एक-एक अमल पर है | इसका अचानक से अहसास हुआ, मगर आवाम के फैसले के बाद | मोहतरमा इंदिरा गांधी खुद भी हार गयी | उनकी हार से न जाने कितने घरों में कई-कई दिनों तक चूल्हा नहीं जला | खैर, वे हार गई ये कम था, किस्से हार गई यह ज्यादा | मुझसे रहा न गया और यह शेर कह दिया –

ये हार-जीत तो किस्मात के खेल है यारो
मलाल ये है कि प्यादों से पिट गए है वजीर
तबदीली क्या हुई ? चंद लोग कुर्सियों से उतर गए,
चंद लोग कुर्सी पर बैठ गए,

फिर मैंने यह शेर कहा–
गरज नसीब में लिखी रही असीरी ही
किसी की कैद से छुटा किसी की कैद में हू

मेरी ग़ज़ल का एक और शेर
वो जिसका खून था वो भी शिनाख्त कर न सका
हथेलियों पर लहू का रचाव ऐसा था
यह लिखने में और बोलने में मुझे बड़ी दुश्वारी होगी कि मै किन-किन शायरों को पसंद करता हू, सब अपने दोस्त है ! किसी का नाम छुट गया तो यह ज्यादती होगी |

टी.एस. इलियट ने लिखा है कि साहित्य काल के अधीन नहीं है और सब कवि समकालीन होते है | उन्होंने उदहार दिया कि यदि कोई कवी महाकाव्य लिखता है तो वह होमर, वर्जिल तथा मिल्टन की बनाई हुई परम्परा से अलग नहीं होता | उसे उस परम्परा से जुडना होता है, क्योकि उसके काव्य का मूल्यांकन पुराने कवियों के काव्य में मापदंड से होता है | इसी प्रकार ग़ज़ल कहने के लिए कलम उठाते ही कवि उस दरबार में प्रवेश करता है, जिसमे ग़ालिब, मीर, मोमिन, जौक, फ़िराक इत्यादि बैठे होते है | उसे कुर्सी तो मिलती है किन्तु वो कहा बैठेगा, इसका निर्णय उसके काव्य से होता है | उसके काव्य कि गुणवत्ता से इस बात का निर्णय होगा कि वो उन कवियों के बराबर बैठे या उनसे ऊँची कुर्सी पर | यह साहित्य कि समय निरपेक्षता कही जाती है |

8 नवम्बर 1925 को लखनऊ में जन्मे कृष्णबिहारी नूर की कुर्सी उस दरबार में सुरक्षित है, जिसमे ग़ालिब, मीर से लेकर फ़िराक और आज तक के भारत के देश प्रिय और प्रतिभाशाली कवी और शायर विराजमान है | 30 मई 2003 को अपने जन्नतनशी होने के पहले तक आप साहित्य में लगातार सक्रीय रहे और उनकी कुछ प्रमुख साहित्यिक रचनाए है –

दुख-सुख, तपस्या ( उर्दू में), समंदर मेरी तलाश में (हिंदी में), तजल्लिये नूर ( उर्दू में) सुप्रसिद्ध साहित्यकार कन्हैयालाल नंदन के संपादन में एक संकलन मेरे मुक्तक मेरे गीत, मेरे गीत है तुम्हारे, मेरी लंबी कविताये जैसी अनेक किताबे नूर के रचनाक्रम से साहित्य में अपनी रौशनी फैलाये हुए है |

यह लेख अरविन्द मंडलोई की कृष्ण बिहारी नूर से बातचीत के आधार पर लिखा गया है |

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  1. नूर साहब की शायरी का तो मैं दीवाना रहा हूँ...उनके शेर हमेशा आपके साथ रहते हैं...ये ही उनके कलाम की खूबी है...मैंने अपने ब्लॉग पर "किताबों की दुनिया" श्रृंखला के तहत उन पर एक पोस्ट लिखी थी...फुर्सत मिले तो पढ़ें...

    http://ngoswami.blogspot.in/2010/11/41.html

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